श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.16.41 
महत्त्वं गङ्गायाः सततमिदमाभाति नितरां प्रदेषा श्री - विष्णोश्चरण - कमलोत्पत्ति - सुभगा ।
द्वितीय - श्री - लक्ष्मीरिव सुर - नरैरर्थ्य - चरणा भवानी - भर्तुर्या शिरसि विभवत्यद्भुत - गुणा ॥41॥
 
 
अनुवाद
“माँ गंगा की महानता सदैव विराजमान रहती है। वे परम सौभाग्यशाली हैं क्योंकि वे भगवान विष्णु के चरणकमलों से प्रकट हुई हैं। वे सौभाग्य की द्वितीय देवी हैं, और इसीलिए देवताओं और मानवता दोनों द्वारा उनकी सदैव पूजा की जाती है। वे सभी अद्भुत गुणों से युक्त होकर भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं।”
 
"The greatness of Mother Ganga will always shine. She is the most fortunate, for she springs from the lotus feet of Lord Vishnu. She is the second Lakshmi, and therefore, gods and humans alike worship her. Possessing all these wonderful qualities, she adorns the head of Lord Shiva."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)