भक्ति-रत्नाकर में केशव कश्मीरी का उल्लेख किया गया है तथा निम्बार्क-सम्प्रदाय में उनके पूर्व के आचार्यों का नाम दिया गया है - (१) श्रीनिवास आचार्य, (२) विश्व आचार्य, (३) पुरूषोत्तम, (४) विलास, (५) स्वरूप, (६) माधव, (७) बलभद्र, (8) पद्म, (९) श्याम, (१०) गोपाल, (११) कृपा, (१२) देव आचार्य, (१३) सुन्दर भट्ट, (१४) पद्मनाभ, (१५) उपेन्द्र, (१६) रामचन्द्र, (१७) वामन, (१८) कृष्ण, (१९) पद्माकर, (२०) श्रवण, (२१) भूरी, (२२) माधव, (२३) श्याम, (२४) गोपाल, (२५) बलभद्र, (२६) गोपीनाथ, (२७) केशव, (२८) गोकुल तथा (२९) केशव कश्मीरी। भक्ति-रत्नाकर में वर्णित है कि केशव कश्मीरी विद्या की देवी माँ सरस्वती के परम भक्त थे। उनकी कृपा से वे अत्यन्त प्रभावशाली विद्वान बने और देश के चारों कोनों के सभी विद्वानों में श्रेष्ठतम चैम्पियन थे। अतः उन्हें 'दिग्विजयी' की उपाधि मिली, जिसका अर्थ है - "जिसने सभी दिशाओं में सभी को जीत लिया हो।" वे कश्मीर के एक प्रतिष्टित ब्राह्मण परिवार से सम्बन्ध रखते थे। बाद में, श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा से उन्होंने चैम्पियनशिप जीतने का व्यवसाय छोड़ दिया और महाभक्त बन गये। वे वैदिक संस्कृति के वैष्णव सम्प्रदायों में से एक, निम्बार्क-सम्प्रदाय में सम्मिलित हो गये।
