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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.16.25 
तबे विष्णुप्रिया - ठाकुराणीर परिणय ।
तबे त’ करिल प्रभु दिग्विजयी जय ॥25॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भगवान चैतन्य ने भाग्य की देवी विष्णुप्रिया से विवाह किया और तत्पश्चात् उन्होंने विद्या के क्षेत्र में अग्रणी केशव कश्मीरी को पराजित किया।
 
Later Chaitanya Mahaprabhu married Lakshmi Devi Vishnupriya and after that he defeated the victorious scholar named Keshav Kashmiri.
तात्पर्य
जिस तरह आज के युग में खेल-कूद के क्षेत्र में अनेक चैम्पियन हैं, ठीक उसी तरह प्राचीन भारत में भी अनेक विद्वान विद्या के क्षेत्र में चैम्पियन थे। उन्हीं में से एक हैं केशव कश्मीरी, जो कश्मीर राज्य से थे। उन्होंने समूचे भारतवर्ष का भ्रमण किया और अंततः नवद्वीप आकर वहाँ के प्रकाण्ड विद्वानों को चुनौती दी। किन्तु दुर्भाग्य से नवद्वीप के विद्वानों को वे पराजित न कर सके, क्योंकि उन्हें बालक विद्वान चैतन्य महाप्रभु के हाथों पराजय मिली। बाद में वे समझ गये कि चैतन्य महाप्रभु कोई और नहीं पर भगवान हैं। अतः उन्होंने उनको आत्मसमर्पण किया और आगे चलकर वे निम्बार्क सम्प्रदाय के शुद्ध वैष्णव बन गये। उन्होंने 'कोस्तुभ-प्रभा' नामक टीका लिखी, जो निम्बार्क-सम्प्रदाय के वेदान्त भाष्य 'परिजाता-भाष्य' की टीका है।

भक्ति-रत्नाकर में केशव कश्मीरी का उल्लेख किया गया है तथा निम्बार्क-सम्प्रदाय में उनके पूर्व के आचार्यों का नाम दिया गया है - (१) श्रीनिवास आचार्य, (२) विश्व आचार्य, (३) पुरूषोत्तम, (४) विलास, (५) स्वरूप, (६) माधव, (७) बलभद्र, (8) पद्म, (९) श्याम, (१०) गोपाल, (११) कृपा, (१२) देव आचार्य, (१३) सुन्दर भट्ट, (१४) पद्मनाभ, (१५) उपेन्द्र, (१६) रामचन्द्र, (१७) वामन, (१८) कृष्ण, (१९) पद्माकर, (२०) श्रवण, (२१) भूरी, (२२) माधव, (२३) श्याम, (२४) गोपाल, (२५) बलभद्र, (२६) गोपीनाथ, (२७) केशव, (२८) गोकुल तथा (२९) केशव कश्मीरी। भक्ति-रत्नाकर में वर्णित है कि केशव कश्मीरी विद्या की देवी माँ सरस्वती के परम भक्त थे। उनकी कृपा से वे अत्यन्त प्रभावशाली विद्वान बने और देश के चारों कोनों के सभी विद्वानों में श्रेष्ठतम चैम्पियन थे। अतः उन्हें 'दिग्विजयी' की उपाधि मिली, जिसका अर्थ है - "जिसने सभी दिशाओं में सभी को जीत लिया हो।" वे कश्मीर के एक प्रतिष्टित ब्राह्मण परिवार से सम्बन्ध रखते थे। बाद में, श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा से उन्होंने चैम्पियनशिप जीतने का व्यवसाय छोड़ दिया और महाभक्त बन गये। वे वैदिक संस्कृति के वैष्णव सम्प्रदायों में से एक, निम्बार्क-सम्प्रदाय में सम्मिलित हो गये।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)