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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.16.23 
घरे आइला प्रभु बहु लञा धन - जन ।
तत्त्व - ज्ञाने कैला शचीर दुःख विमोचन ॥23॥
 
 
अनुवाद
जब भगवान अपने साथ अपार धन-संपत्ति और अनेक अनुयायियों को लेकर घर लौटे, तो उन्होंने शचीदेवी को उनके दुःख से मुक्ति दिलाने के लिए दिव्य ज्ञान के विषय में बताया।
 
When Mahaprabhu returned home with abundant wealth and many followers, he preached divine knowledge to Shachidevi to relieve her of grief.
तात्पर्य
भगवद् गीता (२.१३) में कहा गया है:

देहिनो ऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा

तथा देहान्तर-प्राप्तिर् धीरस्तत्र न मुह्यति

"जैसे देहधारी आत्मा इस शरीर में निरंतर लड़कपन से युवावस्था और फिर बुढ़ापे की अवस्था से गुजरता है, वैसे ही मृत्यु के समय आत्मा दूसरे शरीर में भी प्रवेश करता है। आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति इस परिवर्तन से विचलित नहीं होता।" भगवद् गीता या अन्य वैदिक साहित्य के ऐसे श्लोक किसी के दिवंगत होने की स्थिति पर बहुमूल्य निर्देश देते हैं। भगवद् गीता या श्रीमद भागवतम से ऐसे निर्देशों पर चर्चा करके, एक विचारशील व्यक्ति निश्चित रूप से समझ सकता है कि आत्मा कभी नहीं मरती, बल्कि एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती रहती है। इसे आत्मा का प्रवास कहते हैं। एक आत्मा इस भौतिक संसार में प्रवेश करती है और माता-पिता, बहन-भाइयों, पत्नी और बच्चों के साथ शारीरिक संबंध बनाती है, लेकिन ये सभी संबंध शरीर से संबंधित होते हैं, आत्मा से नहीं। इसलिए, जैसा कि भगवद् गीता में वर्णित है, धीरस्तत्र न मुह्यति: जो विचारशील होता है वह इस भौतिक संसार में ऐसे असाधारण परिवर्तनों से विचलित नहीं होता। ऐसे निर्देशों को तत्व-कथा या वास्तविक सत्य कहा जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)