श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  1.16.107 
प्राते आ सि’ प्रभु - पदे लइल शरण ।
प्रभु कृपा कैल, ताँर खण्डिल बन्धन ॥107॥
 
 
अनुवाद
अगली सुबह कवि भगवान चैतन्य के पास आया और उनके चरणकमलों में शरणागत हो गया। भगवान ने उस पर कृपा की और उसके सारे भौतिक मोह-बंधन को तोड़ दिया।
 
The next day, the poet came to Lord Chaitanya and surrendered at his feet. The Lord blessed him and severed all his bonds of material attachment.
तात्पर्य
भगवद गीता में भगवान श्री कृष्ण ने जो उपदेश दिए वो ही उपदेश भगवान चैतन्य महाप्रभु ने भी दिए, "हर परिस्थिति में मेरे पास आत्मसमर्पण कर दो"। भक्त ने प्रभु को आत्मसमर्पण किया, और प्रभु ने उसका पक्ष लिया। भगवान जिसका पक्ष लेते हैं, वह मावरिक बंधन से मुक्त हो जाता है, जैसा कि भगवद गीता (4.9) में कहा गया है: त्याग कर देह को फिर जन्म नहीं होता, मुझे प्राप्त हो जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)