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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  1.16.102 
दोष - गुण - विचार - एइ अल्प क रि’ मानि ।
कवित्व - करणे शक्ति, ताँहा से वाखानि ॥102॥
 
 
अनुवाद
"ऐसी गलतियों को नगण्य ही समझना चाहिए। देखना तो यह चाहिए कि ऐसे कवियों ने अपनी काव्य-शक्ति का प्रदर्शन किस प्रकार किया है।"
 
Such flaws should be considered insignificant. One should only consider how such poets have demonstrated their poetic prowess.
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवतम (1.5.11) में ऐसा कहा गया है:

तद्वाग-विसर्गो जनताघ-विप्लवो-

 यस्मिन प्रति-श्लोकमबद्धवत्यपि

नामान्यनंतस्य यशोऽङ्कितानि यत्

 शृण्वंति गायंति गृणंति साधवः

"भगवान की महिमा का व्याख्यान करते हुए, अनुभवहीन लोग कई दोषों वाली कविता भी लिख सकते हैं, पर इसमें भगवान के महिमामंडन के होने के कारण, महान व्यक्ति उसे पढ़ते हैं, सुनते हैं और जपते हैं।" इसकी सूक्ष्म साहित्यिक विसंगतियों के बावजूद, व्यक्ति को कविता का अध्ययन उसके विषय-वस्तु की योग्यता के आधार पर अवश्य करना चाहिए। वैष्णव दर्शन के अनुसार, कोई भी साहित्य जो भगवान की महिमा करता है, चाहे ठीक से लिखा गया हो या नहीं, प्रथम श्रेणी का होता है। अन्य कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है। भावभूति या श्रीकंठ की काव्य रचनाओं में मालती-माधव, उत्तर-चरित, वीर-चरित और कई इसी प्रकार के संस्कृत नाटक शामिल हैं। इस महान कवि का जन्म भोजराज के समय में एक ब्राह्मण नीलकंठ के बेटे के रूप में हुआ था। कालिदास का प्रस्फुटन महाराजा विक्रमादित्य के समय में हुआ था, और वह राज्य कवि बन गए थे। उन्होंने कुमार-सम्भव, अभिज्ञान-शाकुंतल और मेघ-दूत सहित लगभग तीस से चालीस संस्कृत नाटकों की रचना की। उनका नाटक रघु-वंश विशेष रूप से प्रसिद्ध है। हम पहले ही आदि-लीला के अध्याय तेरह में जयदेव का वर्णन कर चुके हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)