माता बले , - ताइ दिब, या तुमि मागिबे ।
प्रभु कहे, - एकादशीते अन्न ना खाइबे ॥9॥
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अनुवाद
उसकी माँ ने उत्तर दिया, “मेरे प्यारे बेटे, तुम जो भी माँगोगे, मैं तुम्हें दूँगी।” तब भगवान ने कहा, “मेरी प्यारी माँ, कृपया एकादशी के दिन अन्न न खाओ।”
His mother said, “My dear son, I will give you whatever you ask for.” Then Mahaprabhu said, “Dear mother, please do not eat food on Ekadashi.”
तात्पर्य
बचपन से ही श्री चैतन्य महाप्रभु ने एकादशी के दिन उपवास रखने की प्रथा आरंभ की। श्रील जीव गोस्वामी द्वारा रचित भक्ति-संदर्भ ग्रंथ में स्कंदपुराण से उद्धृत किया गया है कि जो व्यक्ति एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह अपने माता, पिता, भाई तथा गुरु का हत्यारा बन जाता है और यदि वह वैकुण्ठ लोक को प्राप्त भी हो जाता है तो भी उसका पतन अवश्यम्भावी है। अतः एकादशी को विष्णु के लिए अन्न, दाल सहित समस्त वस्तुएं पकाई जाती हैं, किंतु यह नियम है कि एकादशी के दिन वैष्णव को विष्णु-प्रसाद भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि वैष्णव विष्णु को अर्पित भोग्य वस्तु के अतिरिक्त दूसरी कोई भोज्य वस्तु ग्रहण नहीं करता, किंतु एकादशी के दिन वैष्णव को विष्णु को अर्पित महाप्रसाद का भी स्पर्श नहीं करना चाहिए, यद्यपि वह प्रसाद अगले दिन भोजन करने के लिए रखा जा सकता है। एकादशी के दिन चाहे भगवान विष्णु को समर्पित ही क्यों न हो, किसी भी प्रकार का अन्न ग्रहण करना पूर्णरूपेण निषिद्ध है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥