श्रील भक्ति विनोद ठाकुर कहते हैं की व्याकरण पर एक पंजि-टीका नामक टीका थी जिसकी बाद में श्री चैतन्य महाप्रभु ने बहुत अच्छे ढंग से व्याख्या की थी।