श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु की पौगण्ड-लीलाएँ  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.15.6 
अल्प - काले हैला पञ्जी - टीकाते प्र वीण ।
चिर - कालेर प डुया जिने हइया नवीन ॥6॥
 
 
अनुवाद
वे शीघ्र ही पंजी-टीका पर भाष्य करने में इतने निपुण हो गये कि वे अन्य सभी विद्यार्थियों पर विजय प्राप्त कर सके, यद्यपि वे एक नवदीक्षित थे।
 
He soon became proficient in interpreting the Panji-Tika, due to which, despite being a new student, he became the leader among all the students.
तात्पर्य
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर कहते हैं की व्याकरण पर एक पंजि-टीका नामक टीका थी जिसकी बाद में श्री चैतन्य महाप्रभु ने बहुत अच्छे ढंग से व्याख्या की थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)