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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु की पौगण्ड-लीलाएँ  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.15.5 
गङ्गादास पण्डित - स्थाने पड़ेन व्याकरण ।
श्रवण - मात्रे कण्ठे कैल सूत्र - वृत्ति - गण ॥5॥
 
 
अनुवाद
जब भगवान गंगादास पंडित के यहां व्याकरण का अध्ययन कर रहे थे, तो वे व्याकरण के नियमों और परिभाषाओं को एक बार सुनकर ही कंठस्थ कर लेते थे।
 
When Mahaprabhu was studying grammar at Shri Ganga Das Pandit's place, he would instantly memorize all the rules and definitions of grammar after listening to them once.
तात्पर्य
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर कहते हैं कि भगवान को एक विष्णु नामक शिक्षक और एक अन्य शिक्षक सुदर्शन द्वारा शिक्षा दी गई थी। बाद में, जब वह कुछ बड़े हो गए, तो वे गंगा दास पंडिता की देखरेख में थे, जिन्होंने उन्हें उच्च स्तर का व्याकरण सिखाया। संस्कृत भाषा का अध्ययन करने के बारे में गंभीर किसी को भी पहले व्याकरण सीखना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि केवल संस्कृत व्याकरण का अध्ययन समाप्त करने में कम से कम बारह वर्ष लगते हैं, लेकिन एक बार जब कोई व्याकरणिक नियमों और विनियमों को अच्छी तरह से सीख लेता है, तो संस्कृत में अन्य सभी शास्त्रों या विषयों को समझना अत्यंत आसान हो जाता है, क्योंकि संस्कृत व्याकरण शिक्षा का द्वार है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)