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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु की पौगण्ड-लीलाएँ  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.15.14 
भाल हैल , - विश्वरूप सन्न्यास करिल ।
पितृ - कुल, मातृ - कुल, दुइ उद्धारिल ॥14॥
 
 
अनुवाद
“मेरे प्रिय माता और पिता,” भगवान ने कहा, “यह बहुत अच्छा है कि विश्वरूप ने संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया है, क्योंकि इस प्रकार उन्होंने अपने पिता के परिवार और अपनी माँ के परिवार दोनों को मुक्ति प्रदान की है।”
 
Mahaprabhu said, “O Mother and Father! It is good that Vishvarupa has taken sannyasa, because in this way he has saved both his father's and mother's families.”
तात्पर्य
यह कभी-कभी कहा जाता है कि भगवान चैतन्य महाप्रभु ने कलिकाल में संन्यास आश्रम स्वीकार करने की विरोध इसलिए किया क्योंकि शास्त्रों में ऐसा कहा गया है:

अश्वमेधं गवांलम्भं सन्न्यासं पल-पैत्रकम

देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पंच विवर्जयेत्

"कलि युग में पांच अधिनियम निषिद्ध हैं: बलिदान में घोड़े को भेंट करना, बलिदान में गाय को भेंट करना, संन्यास आश्रम को स्वीकार करना, पितृों को मांस से बने भोग चढ़ाना, और एक पुरुष की अपने भाई की पत्नी से बच्चे पैदा करना।" (ब्रह्म-वैवर्त पुराण, कृष्ण-जन्म-खंड 185.180)

फिर भी, हम देखते हैं कि स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास स्वीकार किया और अपने बड़े भाई, विश्वरूप के संन्यास को स्वीकृति दी। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है, भाला हैला, - विश्वरूप संन्यास करिला/ पितृ-कुल, मात्र-कुल, - दुई उद्धारिला। इसलिए, क्या यह सोचा जाना चाहिए कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने ऐसे कथन दिए जो विरोधाभासी हैं? नहीं, वास्तव में उन्होंने नहीं किया। यह सिफारिश की जाती है कि कोई प्रभु की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित करने के लिए संन्यास स्वीकार करे, और हर किसी को उस तरह का संन्यास लेना चाहिए, क्योंकि ऐसा संन्यास स्वीकार करके कोई अपने पैतृक और मात्रक दोनों परिवारों को सबसे अच्छी सेवा प्रदान करता है। परंतु मायावादी संप्रदाय, जिसका व्यावहारिक रूप से कोई अर्थ नहीं है, के संन्यास आश्रम को स्वीकार नहीं करना चाहिए। हम बहुत से मायावादी संन्यासियों को केवल सड़क पर घूमते हुए खुद को ब्रह्म या नारायण समझते हुए देखते हैं और दिन-रात भीख मांगते हुए गुजारते हैं ताकि वे अपने भूखे पेट भर सकें। मायावादी संन्यासी इतने भ्रष्ट हो गए हैं कि उनमें से एक वर्ग है जो सूअरों और कुत्तों की तरह सब कुछ खाते हैं। यह ऐसा भ्रष्ट संन्यास है जो इस युग में निषिद्ध है। वास्तव में, श्रील शंकराचार्य के संन्यास स्वीकार करने के सिद्धांत बहुत सख्त थे, लेकिन बाद में तथाकथित मायावादी संन्यासी अपने झूठे दर्शन के कारण भ्रष्ट हो गए, जो यह बताता है कि संन्यास स्वीकार करने से कोई नारायण बन जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस तरह के संन्यास को खारिज किया। लेकिन संन्यास स्वीकार करना वर्णाश्रम-धर्म की वस्तुओं में से एक है। तो फिर इसे कैसे खारिज किया जा सकता है?

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)