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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  1.14.68 
प्रभु ताँर पूजा पाञा हासिते लागिला ।
श्लोक प ड़ि’ ताँर भाव अङ्गीकार कैला ॥68॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मी द्वारा पूजित होकर भगवान मुस्कुराने लगे। उन्होंने श्रीमद्भागवत का एक श्लोक सुनाया और इस प्रकार लक्ष्मी द्वारा व्यक्त की गई भावना को स्वीकार कर लिया।
 
Mahaprabhu smiled at Lakshmi's worship in this manner. He recited a verse from the Srimad Bhagavatam and accepted Lakshmi's sentiment.
तात्पर्य
इस संदर्भ में उद्धृत श्लोक श्रीमद-भागवतम के दसवें सर्ग के बाईसवें अध्याय का पच्चीसवां श्लोक है। गोपियों ने देवी दुर्गा या कात्यायनी की पूजा की, पर उनकी अंतर्निहित इच्छा भगवान कृष्ण को पति रूप में पाना था। परमात्मा रूप में कृष्ण गोपियों की उत्कट इच्छा समझ सकते थे, इसलिए उन्होंने वस्त्र-हरण के लीला का आनंद लिया। जब गोपियां यमुना नदी में स्नान करने गईं, तो उन्होंने अपने वस्त्र किनारे पर छोड़ दिए और पूरी तरह नग्न होकर पानी में उतर गईं। इस अवसर को देखते हुए, कृष्ण ने सभी के वस्त्र चुरा लिए और एक पेड़ की चोटी पर बैठ गए, लड़कियों को नग्न देखने की इच्छा के साथ कि वे उनके पति बनें। गोपियों की इच्छा थी कि कृष्ण उनके पति बने, और चूंकि केवल अपने पति के सामने ही एक स्त्री नग्न हो सकती है, उनकी इच्छा पूर्ण करने के लिए भगवान कृष्ण ने उनके वस्त्र चुराने का यह लीला करके उनकी प्रार्थना स्वीकार की। जब गोपियों को कृष्ण से उनके वस्त्र वापस मिले, तो कृष्ण ने यह श्लोक सुनाया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)