आत्म लुकाइते प्रभु बलिला ताँहारे ।
आगे केन इहा, माता, ना शिखाले मोरे ॥33॥
अनुवाद
भगवान ने अपनी माता से कहा, "आपने मुझे प्रारम्भ में यह व्यावहारिक दर्शन न सिखाकर आत्म-साक्षात्कार क्यों छुपाया?
Mahaprabhu said to his mother, "Why didn't you teach me this practical philosophy earlier? Why did you keep this method of self-realization hidden from me?"
तात्पर्य
यदि जीवन की शुरुआत से ही किसी को द्वैत या विविधता के वैष्णव दर्शन की शिक्षा दी जाए, तो अद्वैतवाद का दर्शन उसे बहुत अधिक परेशान नहीं करेगा। वास्तव में, सब कुछ सर्वोच्च स्रोत से प्रस्फुटित है (जन्मध्यास्य यतः)। मूल ऊर्जा विविधताओं में प्रदर्शित होती है, ठीक उसी तरह जैसे कि सूर्य का मूल ऊर्जा का प्रस्फुटन सूर्य से प्राप्त होता है, विविधता में प्रकाश और ऊष्मा के रूप में स्वयं को प्रकट करता है। कोई यह नहीं कह सकता कि प्रकाश ऊष्मा है या ऊष्मा प्रकाश है, फिर भी एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए भगवान चैतन्य महाप्रभु का दर्शन अचिन्त्य-भेदभेद है, अकल्पनीय गैर-पृथक्करण और भेद। यद्यपि प्रकाश और ऊष्मा की दो भौतिक अभिव्यक्तियों के बीच एक समानता है, लेकिन उनके बीच एक अंतर भी है। इसी तरह, यद्यपि संपूर्ण ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति प्रभु की ऊर्जा है, फिर भी ऊर्जा विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियों में प्रदर्शित होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)