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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.14.32 
माटिर विकार घटे पानि भ रि’ आनि ।
माटि - पिण्डे धरि यबे, शोषि’ याय पानि” ॥32॥
 
 
अनुवाद
"एक पानी के घड़े में, जो मिट्टी का रूपांतरण है, मैं बहुत आसानी से पानी भर सकता हूँ। लेकिन अगर मैं मिट्टी के एक ढेले पर पानी डालूँ, तो वह ढेला पानी सोख लेगा, और मेरी मेहनत बेकार हो जाएगी।"
 
“I can easily bring water in a pot made of clay, but if I pour water on a lump of clay, the lump will absorb the water and my efforts will be wasted.”
तात्पर्य
शचीमाता द्वारा प्रतिपादित यह सरल दर्शन, यद्यपि वह एक महिला है, एकत्व पर अटकल लगाने वाले मायावादी दार्शनिकों को पराजित कर सकता है। मायावाद दर्शन का दोष यह है कि वह उस विविधता को स्वीकार नहीं करता है जो व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए उपयोगी है। शचीमाता ने उदाहरण दिया कि यद्यपि एक मिट्टी का घड़ा और मिट्टी का एक ढेला मूल रूप से एक ही हैं, व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए जलपात्र उपयोगी है जबकि मिट्टी का ढेला बेकार है। कभी-कभी वैज्ञानिक तर्क देते हैं कि पदार्थ और आत्मा एक हैं, उनके बीच कोई अंतर नहीं है। तथ्यतः, एक उच्च अर्थ में, पदार्थ और आत्मा में कोई अंतर नहीं है, लेकिन किसी को व्यावहारिक ज्ञान होना चाहिए कि पदार्थ, अस्तित्व की एक निम्न अवस्था होने के कारण, हमारे आध्यात्मिक, आनंदमय जीवन के लिए बेकार है, जबकि आत्मा, एक महीन अवस्था होने के कारण, आनंद से भरपूर है। इस संबंध में भागवतम उदाहरण देता है कि गंदगी और आग व्यावहारिक रूप से एक ही है। पृथ्वी से पेड़ उगते हैं और उनकी लकड़ी से आग और धुंआ निकलता है। फिर भी, गर्मी के लिए हम आग का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन पृथ्वी, धुएं या लकड़ी का नहीं। इसलिए, जीवन के लक्ष्य की अंतिम प्राप्ति के लिए, हम पदार्थ की सुस्त लकड़ी या पृथ्वी से नहीं, बल्कि आत्मा की आग से संबंधित हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)