माँ च योऽव्यभिचारेण भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान् समतीत्यैतान ब्रह्म-भूयाय कल्पते
“कोई भी व्यक्ति जो बिना किसी प्रेरणा के आध्यात्मिक भक्ति सेवा करता है, प्रभु की संतुष्टि के लिए ऐसी सेवा प्रदान करता है उसे तुरंत आध्यात्मिक स्तर पर पहुँचा दिया जाता है और उसकी सभी गतिविधियाँ आध्यात्मिक हो जाती हैं।” ब्रह्म-भूयाय से तात्पर्य ब्राह्मण (आध्यात्मिक) गतिविधियों से है। हालाँकि मायावादी दार्शनिक ब्राह्मण तेज में विलीन होने के लिए बहुत उत्सुक हैं, लेकिन उनकी कोई भी ब्राह्मण गतिविधि नहीं होती है। कुछ हद तक वे ब्राह्मण गतिविधियों की सलाह देते हैं, जिसका अर्थ है उनके लिए वेदांत और सांख्य दर्शन का अध्ययन करना, लेकिन उनकी व्याख्याएँ केवल सूखी अटकलें हैं। आध्यात्मिक गतिविधि की विविधताओं की कमी में, वे केवल वेदांत या सांख्य दर्शन का अध्ययन करने के उस स्तर पर लंबे समय तक नहीं रह सकते हैं।
जीवन विभिन्न प्रकार के आनंद के लिए है। जैसा कि वेदांत-सूत्र (1.1.12) में कहा गया है: आनंद-मायोऽभ्यासात। भक्ति सेवा में गतिविधियाँ विविध और आनंद से भरी होती हैं। जैसा कि भगवद-गीता (9.2) में कहा गया है, सभी भक्ति गतिविधियों को करना आसान है (सु-सुखं कर्तुम) और वे शाश्वत और आध्यात्मिक (अव्ययम) हैं। चूँकि मायावादी दार्शनिक यह नहीं समझ सकते हैं, वे मान लेते हैं कि एक भक्त की गतिविधियाँ (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पा-सेवनम् इत्यादि) सभी भौतिक हैं और इसलिए माया हैं। वे इस ब्रह्माण्ड में कृष्ण के आगमन और उनकी गतिविधियों को भी माया मानते हैं। इसलिए, क्योंकि वे हर चीज़ को माया मानते हैं, उन्हें मायावादी के रूप में जाना जाता है।
वास्तव में, आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में, प्रभु की संतुष्टि के लिए अनुकूल रूप से की गई कोई भी गतिविधि आध्यात्मिक होती है। लेकिन एक व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक गुरु के आदेश की अवहेलना करना और अपनी बकवास गतिविधियों को आध्यात्मिक मानना माया है। व्यक्ति को आध्यात्मिक गुरु की कृपा से परम पुरुष ईश्वर के पक्ष को प्राप्त करना चाहिए। इसलिए व्यक्ति को पहले आध्यात्मिक गुरु को प्रसन्न करना चाहिए, और यदि वह प्रसन्न है, तो हमें समझना चाहिए कि परम व्यक्तित्व भगवान भी प्रसन्न हैं। लेकिन अगर आध्यात्मिक गुरु हमारे कार्यों से नाराज़ हैं, तो वे आध्यात्मिक नहीं हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इसकी पुष्टि करते हैं: यस्य प्रसादाद भगवत्-प्रसादो यस्याप्रसादान न गतिः कुतोऽपि। गतिविधियाँ जो आध्यात्मिक गुरु को प्रसन्न करती हैं उन्हें आध्यात्मिक माना जाना चाहिए, और उन्हें प्रभु को संतुष्ट करने वाला स्वीकार किया जाना चाहिए।
लॉर्ड चैतन्य महाप्रभु, सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु के रूप में, ने अपनी माँ को मायावादी दर्शन के बारे में निर्देश दिया। यह कहते हुए कि शरीर गंदगी है और खाने-पीने की चीजें भी गंदगी हैं, उन्होंने कहा कि सब कुछ माया है। यह मायावादी दर्शन है। मायावादियों का दर्शन दोषपूर्ण है क्योंकि यह मानता है कि सब कुछ माया है सिवाय बकवास के जो वे बोलते हैं। यह कहते हुए कि सब कुछ माया है, मायावादी दार्शनिक भक्ति सेवा का अवसर खो देते हैं, और इसलिए उनका जीवन बर्बाद हो जाता है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने सलाह दी, मायावादी-भाष्य सुनिले हया सर्व-नाश (सीसी। मध्य 6.169)। यदि कोई मायावादी दर्शन को स्वीकार करता है, तो उसकी उन्नति हमेशा के लिए बर्बाद हो जाती है।
