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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  1.13.99 
सेइ - काले निजालय, उठिया अद्वैत राय ,
नृत्य करे आनन्दित - मने ।
हरिदासे ल ञा सङ्गे, हुङ्कार - कीर्तन - रङ्गे
केने नाचे, केह नाहि जाने ॥99॥
 
 
अनुवाद
उस समय श्री अद्वैत आचार्य प्रभु शांतिपुर स्थित अपने घर में आनंदित भाव से नृत्य कर रहे थे। हरिदास ठाकुर को साथ लेकर वे नृत्य कर रहे थे और ऊँची आवाज़ में हरे कृष्ण का जाप कर रहे थे। लेकिन वे क्यों नृत्य कर रहे थे, यह कोई नहीं समझ पा रहा था।
 
At that time, Sri Advaita Acharya Prabhu was dancing in a joyous mood in his home in Shantipur. He was dancing with Haridasa Thakura by his side, chanting Hare Krishna loudly. But no one could understand why he was dancing.
तात्पर्य
ऐसा समझा जाता है कि उस समय अद्वैत प्रभु अपने पैतृक घर शांतिपुर में थे। हरिदास ठाकुर अक्सर उनसे मिलने जाया करते थे। संयोग से, इसलिए, वे भी वहां थे, और जैसे ही श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ, वे दोनों तुरंत नाचने लगे। लेकिन शांतिपुर के किसी को समझ नहीं आ रहा था कि वे दो संत क्यों नाच रहे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)