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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  1.13.82 
याहाँ ताहाँ सर्व - लोक करये सम्मान ।
घरे पाठा इया देय धन, वस्त्र, धान ॥82॥
 
 
अनुवाद
"मैं जहाँ भी जाता हूँ, सभी लोग मुझे सम्मान देते हैं। मेरे बिना माँगे भी, वे स्वेच्छा से मुझे धन, वस्त्र और धान देते हैं।"
 
"Wherever I go, people respect me. They willingly give me money, clothes, and grain without my asking."
तात्पर्य
एक ब्राह्मण कभी किसी का सेवक नहीं बनता है। किसी और की सेवा करना शूद्रों का काम है। एक ब्राह्मण हमेशा स्वतंत्र होता है क्योंकि वह समाज का शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु और सलाहकार होता है। समाज के सदस्य उसे जीवन की सभी आवश्यकताएँ प्रदान करते हैं। भगवद-गीता में भगवान कहते हैं कि उन्होंने समाज को चार भागों में विभाजित किया है - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इस वैज्ञानिक विभाजन के बिना समाज सुचारू रूप से नहीं चल सकता। एक ब्राह्मण को समाज के सभी सदस्यों को अच्छी सलाह देनी चाहिए, एक क्षत्रिय को प्रशासन की देखभाल करनी चाहिए, समाज में कानून और व्यवस्था बनाए रखनी चाहिए, वैश्यों को समाज की सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादन और व्यापार करना चाहिए, जबकि शूद्रों को समाज के उच्च वर्गों (ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों) की सेवा करनी चाहिए।

जगन्नाथ मिश्र एक ब्राह्मण थे; इसलिए लोग उन्हें सभी शारीरिक आवश्यकताएं - पैसा, कपड़ा, अनाज आदि भेजते थे। जब भगवान चैतन्य शचीमाता के गर्भ में थे, जगन्नाथ मिश्र को बिना मांगे जीवन की ये सभी आवश्यकताएं मिल गईं। अपने परिवार में प्रभु की उपस्थिति के कारण, हर कोई उन्हें एक ब्राह्मण के रूप में उचित सम्मान देता था। दूसरे शब्दों में, यदि कोई ब्राह्मण या वैष्णव प्रभु के शाश्वत सेवक के रूप में अपनी स्थिति से जुड़ा रहता है और प्रभु की इच्छा का पालन करता है, तो उसके व्यक्तिगत रखरखाव या उसके परिवार की जरूरतों के लिए कमी का कोई सवाल ही नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)