कृष्ण अवतरि’ करेन भक्तिर विस्तार ।
तबे त’ सकल लोकेर हइबे निस्तार ॥69॥
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अनुवाद
श्रील अद्वैत आचार्य प्रभु ने सोचा, "यदि कृष्ण स्वयं भक्ति सेवा के पंथ को वितरित करने के लिए प्रकट होते हैं, तभी सभी लोगों के लिए मुक्ति संभव होगी।"
Srila Advaita Acharya Prabhu thought, “Only if Krishna himself incarnates to distribute the Bhakti Sampradaya is it possible for all people to be saved.”
तात्पर्य
जिस प्रकार एक अपराधी मुखिया कार्यकारी अधिकारी, अध्यक्ष, या राजा के विशेष पक्ष द्वारा दया पा सकता है, इसी प्रकार इस कलि-युग के पापी लोग केवल भगवान के स्वयं या एक विशेष अधिकृत व्यक्ति द्वारा ही मुक्त किए जा सकते हैं। श्रील अद्वैत आचार्य प्रभु की इच्छा थी कि भगवान इस युग की पतित आत्माओं को उद्धार के लिए स्वयं प्रकट हों।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥