किन्तु सर्व - लोक दे खि’ कृष्ण - बहिर्मुख ।
विषये निमग्न लोक दे खि’ पाय दुःख ॥67॥
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अनुवाद
लेकिन श्री अद्वैत आचार्य प्रभु को यह देखकर दुःख हुआ कि कृष्णभावनामृत से रहित सभी लोग केवल भौतिक इन्द्रिय भोग में विलीन हो रहे हैं।
But Sri Advaita Acharya felt pain when he saw that all people were devoid of Krishna consciousness and were merely immersed in material sense enjoyment.
तात्पर्य
कृष्ण के सच्चे भक्त संसार की गिरी हुई दशा को देखकर हमेशा दुखी होते हैं। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर अक्सर कहते थे, "इस दुनिया में किसी भी चीज़ की कमी नहीं है। केवल कृष्ण चेतना की कमी है।" यही सभी शुद्ध भक्तों का दृष्टिकोण है। मानव समाज में कृष्ण चेतना की इस कमी के कारण, लोग अत्यधिक दुख भोग रहे हैं, जो अज्ञानता और इंद्रिय सुख के समुद्र में डूबे हुए हैं। एक भक्त दर्शक दुनिया में ऐसी स्थिति को देखकर बहुत दुखी होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥