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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  1.13.65 
सर्व - शास्त्रे कहे कृष्ण - भक्तिर व्याख्यान ।
ज्ञान, योग, तपो - धर्म नाहि माने आन ॥65॥
 
 
अनुवाद
वैदिक संस्कृति के सभी प्रकट शास्त्रों में भगवान कृष्ण की भक्ति का सर्वत्र वर्णन किया गया है। अतः भगवान कृष्ण के भक्त दार्शनिक चिंतन, योग, अनावश्यक तपस्या और तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों को स्वीकार नहीं करते। वे भक्ति के अतिरिक्त किसी अन्य विधि को स्वीकार नहीं करते।
 
All the authoritative scriptures of Vedic culture are filled with expositions of devotion to Lord Krishna. Therefore, devotees of Lord Krishna reject philosophical reasoning, yoga, meaningless austerities, or so-called religious rituals. They accept no other method except devotion.
तात्पर्य
हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन इसी सिद्धांत का अनुसरण करता है। हम कृष्ण चेतना एवं भक्ति सेवा के अलावा आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए किसी और विधि को मान्यता नहीं देते हैं। कभी-कभी ज्ञान, योग, तप और धर्म का अनुसरण करने वाले समूह हमारी आलोचना करते हैं, लेकिन सौभाग्य से हम उनके साथ कोई समझौता करने में असमर्थ हैं। हम केवल भक्ति सेवा के मंच पर खड़े हैं और दुनिया भर में एक ही सिद्धांतों का प्रचार करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)