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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  1.13.61 
राढ़देशे जन्मिला ठाकुर नित्यानन्द ।
गङ्गादास पण्डित, गुप्त मुरारि, मुकुन्द ॥61॥
 
 
अनुवाद
राधादेश में, बंगाल का वह भाग जहाँ गंगा दिखाई नहीं देती, नित्यानंद प्रभु, गंगादास पंडित, मुरारी गुप्त और मुकुंद ने जन्म लिया।
 
Radhdesh is that part of Bengal where the Ganges is not visible. It was in Radhdesh that Nityananda Prabhu, Gangadasa Pandit, Murari Gupta, and Mukunda were born.
तात्पर्य
यहाँ राढ़ा-देश एकचक्रा नाम के एक गाँव की बात करता है, जो कि बर्दवान के ठीक बगल में, बीरभूम जिले में स्थित है। बर्दवान रेलवे स्टेशन के बाद एक अन्य शाखा रेखा आती है, जिसे पूर्वी रेलवे की लूप लाइन कहा जाता है और इस पर मल्लारपुरा नाम का एक रेलवे स्टेशन आता है। इस रेलवे स्टेशन से आठ मील पूर्व में, एकचक्रा गाँव अब भी बसा हुआ है। एकचक्रा गाँव उत्तर और दक्षिण में फैला है और इसका क्षेत्रफल लगभग आठ मील है। अन्य गाँव, जैसे वीरचन्द्रा-पुरा और वीरभद्रा-पुरा, एकचक्रा के गाँव के क्षेत्र में ही स्थित हैं। वीरभद्र गोस्वामी के पवित्र नाम के सम्मान में, इन स्थानों को वीरचन्द्रा-पुरा और वीरभद्रा-पुरा के नाम से जाना जाता है।

बांग्ला वर्ष 1331 (A.D. 1924 में) एकचक्रा-ग्राम के मंदिर में एक वज्रपात हुआ था। इसलिए मंदिर अब एक टूटी-फूटी अवस्था में है। इससे पहले, उस क्षेत्र में ऐसी कोई दुर्घटनाएँ नहीं हुई थीं। मंदिर के अंदर श्री कृष्ण की एक देवता है जिसे श्री नित्यानंद प्रभु ने स्थापित किया था। देवता का नाम बंकिम राय या बाँका राय है।

बंकिम राय के दाहिनी ओर एक जाह्नवी की देवता है, और उनकी बाईं ओर श्रीमती राधारानी हैं। मंदिर के पुजारी कहते हैं कि भगवान नित्यानंद प्रभु बंकिम राय के शरीर में प्रवेश कर गए थे और इसलिए जाह्नवा-माता की देवता को बाद में बंकिम राय के दाहिनी ओर रखा गया था। इसके बाद, मंदिर के अंदर कई अन्य देवताओं को स्थापित किया गया था। मंदिर के अंदर एक अन्य सिंहासन पर मुरलीधर और राधा-माधव की देवताएँ हैं। एक अन्य सिंहासन पर मनमोहन, वृंदावन-चंद्र और गौर-नीताई की देवताएँ हैं। लेकिन बंकिम राय वह देवता हैं जिन्हें मूल रूप से नित्यानंद प्रभु द्वारा स्थापित किया गया था।

मंदिर के पूर्वी हिस्से में कदंब-खंडी के नाम से एक घाट है जो यमुना नामक नदी के किनारे पर स्थित है और कहा जाता है कि बंकिम राय की देवता पानी में तैर रही थीं और भगवान नित्यानंद प्रभु ने उन्हें उठाया और फिर उन्हें मंदिर में स्थापित किया। तत्पश्चात, वीरचन्द्रा-पुरा गाँव के भड्ढापुरा नामक स्थान में, लगभग आधा मील पश्चिम में, एक नीम के पेड़ के नीचे, श्रीमती राधारानी मिलीं। इस कारण से, बंकिम राय की राधारानी को भड्ढापुरेरा ठाकुरानी के नाम से जाना जाता था, जो कि भड्ढापुरा की मालकिन थीं। एक अन्य सिंहासन पर, बंकिम राय के दाहिनी ओर, योगमाया की एक देवता हैं।

अब मंदिर और मंदिर के गलियारे एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित हैं, और मंदिर के सामने एक ठोस संरचना पर एक कीर्तन हॉल है। यह भी कहा जाता है कि मंदिर के उत्तरी हिस्से में भंडीश्वर नाम से भगवान शिव की एक देवता थी और नित्यानंद प्रभु के पिता, हाड़ाई पंडित, उस देवता की पूजा करते थे। हालाँकि, वर्तमान में, भंडीश्वर देवता गायब हैं और उनके स्थान पर जगन्नाथ स्वामी की देवता को स्थापित किया गया है। भगवान नित्यानंद प्रभु ने वास्तव में कोई मंदिर नहीं बनवाया था। मंदिर वीरभद्र प्रभु के समय में बनाया गया था। बांग्ला वर्ष 1298 (A.D. 1891 में), शिवानंद स्वामी नामक एक ब्रह्मचारी ने मंदिर की मरम्मत की, क्योंकि यह जीर्ण-शीर्ण हो गया था।

इस मंदिर में देवता को सत्रह सेर (लगभग तीस-चार पाउंड) चावल और आवश्यक सब्जियों के आधार पर भोजन देने की व्यवस्था है। मंदिर का वर्तमान पुजारी वर्ग गोपीजन-वल्लभानांद के परिवार से है, जो कि नित्यानंद प्रभु की शाखाओं में से एक है। मंदिर के नाम पर एक भूमि बसा है, और इस भूमि से होने वाली आय मंदिर के खर्च का वित्तपोषण करती है। तीन पक्ष है पुजारी गोस्वामियों के जो एक के बाद एक मंदिर प्रबंधन का कार्यभार संभालते हैं। मंदिर से कुछ कदम दूर विश्रामताल नामक एक स्थान है, जहाँ कहा जाता है कि नित्यानंद प्रभु अपने बचपन में राधा-लीला और वृंदावन के विभिन्न अन्य क्रीड़ाओं का अभिनय करके अपने प्रेमियों के साथ खेलने का आनंद लेते थे।

मंदिर के पास एक जगह है जिसका नाम आमलीताला (इम्लिताला), है और इसका नाम वहां एक विशाल इमली के पेड़ वजह से है। नेदाड़ी-सम्प्रदाय नामक एक पक्ष के अनुसार, वीरभद्र प्रभु, बारह सौ नेडा (बौद्ध भिक्षुओं) की सहायता से, श्वेत गंगा नाम की एक विशाल झील खोदी। मंदिर के बाहर गोस्वामियों की कब्रें हैं, और मौडेवर नाम की एक छोटी नदी है, जिसे यमुना का पानी कहा जाता है। इस छोटी नदी से आधे मील की दूरी पर ही श्री नित्यानंद प्रभु का जन्मस्थान है। ऐसा प्रतीत होता है कि मंदिर के सामने एक बड़ा कीर्तन हॉल था, लेकिन बाद में यह जीर्ण-शीर्ण हो गया। अब यह बरगद के पेड़ों से ढंका हुआ है। बाद में, एक मंदिर का निर्माण किया गया जिसके भीतर गौर-नित्यानंद देवता विद्यमान हैं। मंदिर का निर्माण स्वर्गीय प्रसन्नकुमार कारफर्मा ने कराया था। बंगाली वर्ष 1323 में वैशाख महीने (अप्रैल-मई) में उनकी स्मृति में एक शिलापट्ट स्थापित किया गया था।

जिस स्थान पर नित्यानंद प्रभु प्रकट हुए उसे गर्भवास कहा जाता है। वहां एक मंदिर में पूजा जारी रखने के लिए लगभग तैंतालीस बीघे (चौदह एकड़) भूमि आवंटित की गई है। दिनाजपुर के महाराजा ने इस संबंध में बीस बीघा (लगभग छह और आधा एकड़) भूमि दान की। ऐसा कहा जाता है कि गर्भवास के नाम से जाने जाने वाले स्थान के पास, हडाई पंडित ने एक प्राथमिक विद्यालय का संचालन किया। इस स्थान के पुजारियों की वंशावली में सूचीबद्ध थे: (1) श्री राघवचंद्र, (2) जगदानंद दास, (3) कृष्णदास, (4) नित्यानंद दास, (5) रामदास, (6) व्रजमोहन दास, (7) कानाई दास, (8) गौरदास, (9) शिवानंद दास और (10) हरिदास। कृष्णदास वृंदावन में चिड़िया-कुंज के थे। उनके विलुप्त होने की तिथि कृष्ण-जन्माष्टमी है। चिड़िया-कुंज एक स्थान है जिसका प्रबंधन अब वृंदावन में शृंगार-घाट के गोस्वामियों द्वारा किया जाता है। उन्हें नित्यानंद परिवार से संबंधित होने के रूप में भी जाना जाता है, संभवतः कृष्णदास के साथ उनके संबंध के आधार पर।

गर्भवास के पास, बकुलातला नामक एक स्थान है जहाँ श्री नित्यानंद प्रभु और उनके मित्र झाला-झपेटा नामक खेल गतिविधियों में भाग लेते थे। वहां एक बकुला का पेड़ है जो अद्भुत है क्योंकि इसकी सभी शाखाएँ और उप-शाखाएँ सर्पों के फनों की तरह दिखती हैं। यह सुझाव दिया गया है कि श्री नित्यानंद प्रभु की इच्छा से, अनंतदेव ने खुद को इस तरह प्रकट किया। पेड़ बहुत पुराना है। ऐसा कहा जाता है कि पहले इसके दो तने थे, लेकिन बाद में, जब नित्यानंद प्रभु के खेल साथियों को एक तने की शाखाओं से दूसरे तने की शाखाओं तक कूदने-फाँदने में असुविधा होती थी, तो नित्यानंद प्रभु ने अपनी दया से, दोनों तनों को एक में मिला दिया।

पास का एक और स्थान हंटुगाडा नामक है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान नित्यानंद प्रभु वहां सभी पवित्र स्थानों को ले आए थे। इसलिए आसपास के गांवों के लोग स्नान करने के लिए वहां जाते हैं, न कि गंगा में। इसका नाम हंटुगाडा इसलिए पड़ा क्योंकि श्रील नित्यानंद प्रभु दही-चिड़ा महोत्सव प्रदर्शन करते थे, जिसमें दही प्रसाद के साथ चावल के टुकड़े बांटे जाते थे और वह प्रसाद को घुटने टेककर ग्रहण करते थे। इस स्थान में एक पवित्र झील है जो पूरे साल पानी से भरी रहती है। गोष्ठाष्टमी के दौरान वहां एक महान मेला आयोजित किया जाता है, और श्री नित्यानंद प्रभु के जन्मदिन पर एक और बड़ा मेला आयोजित किया जाता है। गौर-गणोद्देश-दीपिका (58-63) में वर्णित है कि हलयुध, बलदेव, विश्वरूप और संकर्षण नित्यानंद अवधूत के रूप में प्रकट हुए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)