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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.13.5 
जय श्री - चैतन्यचन्द्रेर भक्त चन्द्र - गण ।
सबार प्रेम ज्योत्स्नाय उज्वल त्रिभुवन ॥5॥
 
 
अनुवाद
उन चन्द्रमाओं की जय हो जो प्रधान चन्द्रमा, भगवान चैतन्यचन्द्र के भक्त हैं! उनकी उज्ज्वल चन्द्रमा की चमक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करती है।
 
All the moons who are devotees of the supreme moon, Chaitanya Mahaprabhu, whose radiant moonlight illuminates the entire universe.
तात्पर्य
इस श्लोक में हम चन्द्रमा का वर्णन चन्द्र-गण के रूप में पाते हैं, जो कि वचन में बहुवचन है। यह इंगित करता है कि बहुत सारे चन्द्रमा हैं। भगवद-गीता (10.21) में भगवान कहते हैं, नक्षत्राणाम अहं शशी: "तारों के बीच, मैं चन्द्रमा हूँ।" सभी तारे चन्द्रमा के समान हैं। पश्चिमी खगोलविद तारों को सूर्य मानते हैं, लेकिन वैदिक खगोलविद, वैदिक शास्त्रों का अनुसरण करते हुए, उन्हें चन्द्रमा मानते हैं। सूर्य में शक्तिशाली रूप से चमकने की क्षमता होती है, और चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश को प्रतिबिंबित करते हैं और इसलिए चमकीले दिखते हैं। चैतन्य-चरितामृत में कृष्ण को सूर्य के समान बताया गया है। सर्वोच्च शक्तिशाली भगवान श्री कृष्ण या भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु हैं, और उनके भक्त भी उज्ज्वल और प्रकाशमान हैं क्योंकि वे सर्वोच्च सूर्य को प्रतिबिंबित करते हैं। चैतन्य-चरितामृता (मध्य 22.31) कहता है:

कृष्ण — सूर्य-समा; माया हय अंधकार

याहाँ कृष्ण, ताहाँ नाही मायारा अधिकार

"कृष्ण सूर्य के समान उज्ज्वल हैं। जैसे ही सूर्य प्रकट होता है, अंधकार या अज्ञान का कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता है।" इसी तरह, वर्तमान श्लोक भी वर्णन करता है कि सभी चंद्रमाओं की रोशनी से, कृष्ण सूर्य के प्रतिबिंब से उज्ज्वल होकर, या चैतन्य महाप्रभु के सभी भक्तों की कृपा से, कलियुग के अंधकार के बावजूद पूरी दुनिया रोशन हो जाएगी। केवल भगवान चैतन्य महाप्रभु के भक्त ही कलियुग के अंधकार, इस युग की जनसंख्या की अज्ञानता को दूर कर सकते हैं। ऐसा कोई और नहीं कर सकता। इसलिए हम चाहते हैं कि कृष्ण चेतना आंदोलन के सभी भक्त सर्वोच्च सूर्य को प्रतिबिंबित करें और इस प्रकार पूरी दुनिया के अंधकार को दूर करें।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)