श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  1.13.48 
चैतन्य - लीलार व्यास , - दास वृन्दावन ।
मधुर करिया लीला करिला रचन ॥48॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के प्रामाणिक रचयिता श्रील वृन्दावन दास ठाकुर, श्रील व्यासदेव के समान ही श्रेष्ठ हैं। उन्होंने लीलाओं का वर्णन इस प्रकार किया है कि वे और भी मधुर होती जाती हैं।
 
Srila Vrindavana Dasa Thakura, the authoritative author of the pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu, is like Srila Vyasadeva. He has described these pastimes in a way that makes them more sweet.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)