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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.13.43 
कृष्णेर वियोगे यत प्रेम - चेष्टित ।
आस्वादिया पूर्ण कैल आपन वाञ्छित ॥43॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण के वियोग में इन सभी आनंदमय गतिविधियों का आनंद लिया और इस प्रकार उन्होंने अपनी इच्छाओं को पूरा किया।
 
In separation from Krishna, Sri Chaitanya Mahaprabhu used to enjoy all these passionate activities and thus fulfill his own desires.
तात्पर्य
श्री चैतन्य-चरितामृत के प्रारंभ में कहा गया है कि भगवान चैतन्य राधिका जी के द्वारा कृष्ण के दर्शन करते समय अनुभव की गई भावनाओं का स्वाद लेने के लिए प्रकट हुए थे। कृष्ण स्वयं राधिका जी के अपने प्रति अनुभव की गई अद्भुत भावनाओं को समझ नहीं पाए और इसलिए उन्होंने राधिका जी की भूमिका को स्वीकार करने और इस प्रकार इन भावनाओं का आनंद लेने की इच्छा की। भगवान चैतन्य राधिका जी की भावनाओं से युक्त कृष्ण हैं; दूसरे शब्दों में, वे राधा और कृष्ण का संयोजन हैं। इसलिए कहा जाता है, श्री-कृष्ण-चैतन्य राधा-कृष्ण नाहिं अन्य। केवल श्री चैतन्य महाप्रभु की पूजा करने से, व्यक्ति राधा और कृष्ण के प्रेम संबंधों का एक साथ आनंद ले सकता है। इसलिए व्यक्ति को राधा-कृष्ण को सीधे नहीं बल्कि श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों के माध्यम से समझने का प्रयास करना चाहिए। श्रील नरसिंह दास ठाकुर इसलिए कहते हैं, रूप-रघुनाथ-पदे हैबे आकुलि, कबे हम बुझब से युगल-प्रीति: "मैं श्री रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी और भगवान चैतन्य के अन्य भक्तों के प्रति सेवा भावना कब विकसित करूँगा और इस प्रकार श्री राधा और कृष्ण के अलौकिक लीलाओं को समझने के योग्य बनूंगा?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)