श्री - राधार प्रलाप यैछे उद्धव - दर्शने ।
सेइमत उन्माद - प्रलाप करे रात्रि - दिने ॥41॥
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अनुवाद
जैसे श्रीमती राधारानी उद्धव से मिलकर असंगत बातें करती थीं, उसी प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु भी दिन-रात श्रीमती राधारानी के भाव में ऐसी आनंदपूर्ण बातचीत का आनंद लेते थे।
Just as Srimati Radharani used to talk incoherently when she met Uddhava, Sri Chaitanya Mahaprabhu used to enjoy the same feeling of Srimati Radharani day and night.
तात्पर्य
इस सम्बन्ध में वृन्दावन में उद्धव से मिलकर श्रीमती राधारानी के एकालाप का उल्लेख किया जाना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने ऐसी कामुक काल्पनिक बातचीत की एक समान तस्वीर प्रस्तुत की। कृष्ण द्वारा उपेक्षा करने के लक्षण से पूर्ण ईर्ष्या और पागलपन से, श्रीमति राधारानी ने एक भौंरे की आलोचना करते हुए एक पागल महिला की तरह बात की। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने समय के अंतिम दिनों में, ऐसे सभी कामुक लक्षणों का प्रदर्शन किया। इस सम्बन्ध में आदि-लीला के चौथे अध्याय, श्लोक 107 और 108 का उल्लेख किया जाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥