Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
शेष बारह वर्षों तक वे जगन्नाथ पुरी में रहे, उन्होंने सभी को सिखाया कि किस प्रकार स्वयं कृष्ण के प्रेम के दिव्य मधुर आनन्द का स्वाद लिया जाए।
For the remaining twelve years he lived in Jagannatha Puri and, having tasted the divine experience of Krishna-love, he taught everyone the method of tasting it.
तात्पर्य
हिंदी-लेख: कृष्णभावनामृत में उन्नत व्यक्ति हमेशा कृष्ण से बिछुड़े होने का अनुभव करता है क्योंकि बिछुड़े होने का भाव कृष्ण के मिलने के भाव से बढ़कर है। जगन्नाथपुरी में इस संसार में विद्यमान अपने अंतिम बारह वर्षों में, श्री चैतन्य महाप्रभु ने संसार के लोगों को सिखाया कि बिछुड़े होने का भाव होने पर कोई कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को कैसे विकसित कर सकता है। कृष्ण से बिछुड़ने और मिलने का भाव, ईश्वरभाव के प्रेम की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। इस भावना का विकास उस समय होता है जब कोई व्यक्ति भक्तिपूर्ण सेवा में गंभीरता से प्रयासरत रहता है। सर्वोच्च अवस्था को प्रेम-भक्ति कहा जाता है, लेकिन यह अवस्था साधना-भक्ति का पालन करके प्राप्त होती है। किसी को भी साधना-भक्ति के नियमों का पालन किए बिना प्रेम-भक्ति के स्तर तक खुद को कृत्रिम रूप से ऊपर उठाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। प्रेम-भक्ति आनंद लेने का स्तर है, जबकि साधना-भक्ति भक्तिपूर्ण सेवा में सुधार की अवस्था है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन में व्यावहारिक उपयोग करके भक्तिपूर्ण सेवा के इस पंथ को विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया। इसलिए, यह कहा जाता है कि आपनी आचारी भक्ति सीखैमु सबरे। श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं कृष्ण हैं, और कृष्ण के भक्त की भूमिका में, उन्होंने पूरी दुनिया को निर्देश दिया कि कोई कैसे भक्ति सेवा का पालन कर सकता है और इस तरह से समय के साथ स्वर्गलोक में अपने घर जा सकता है, वापस भगवान् के पास जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥