अचैतन्यमिदं विश्वं यद्यत्र चैतन्यमीश्वरं
न विदुः सर्वशास्त्रज्ञा ह्यपि भ्राम्यन्ति ते जनाः
"यह भौतिक संसार कृष्ण चेतना से रहित है। भगवान् चैतन्य महाप्रभु कृष्ण चेतना के साक्षात रूप हैं। इसलिए यदि कोई बहुत विद्वान विद्वान या वैज्ञानिक भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु को नहीं समझता है, तो निश्चित रूप से वह इस संसार में व्यर्थ घूम रहा है।"
प्रसारितमहाप्रेमपियूषरससागरे
चैतन्यचन्द्रे प्रकटे यो दीनो दीन एव सः
""श्री चैतन्य महाप्रभु की पंथ की उपस्थिति में उमड़ रहे भक्ति रस के अमृत का लाभ न उठाने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से सबसे गरीब है।""
अवतीर्णे गौरचन्द्रे विस्तीर्णे प्रेमसागरे
सुप्रकाशितरत्नौघे यो दीनो दीन एव सः
""भगवान् चैतन्य महाप्रभु का आगमन अमृत के फैलते समुद्र की तरह है। इस सागर में बहुमूल्य रत्नों को न बटोरने वाला निश्चित रूप से सबसे गरीब है।""
इसी तरह, श्रीमद-भागवतम् (2.3.19, 20, 23) में कहा गया है:
श्वविडवराहोष्ट्रखरैः
संस्तुतः पुरुषः पशुः
न यत्करणपथेतो
जातु नाम गदाधरः
बिले भतो रुकमविक्रमान ये
न श्रृण्वतः कर्णपुटे नरस्य
जिह्वासती darfurikeva सूत
न चोपगायत्युरुगायगाथाः
जीवन् चवो भागवतादृिरेणुं
न जातु मृत्योभिलभेत यस्तु
श्रीविष्णुपद्या मनुजास्तुलस्याः
श्वसन् चवो यस्तु न वेद गंधम्
"एक व्यक्ति जिसका कृष्ण चेतना से कोई संबंध नहीं है, वह मानव समाज में एक महान व्यक्तित्व हो सकता है, लेकिन वास्तव में वह एक महान जानवर से बेहतर नहीं है। इस तरह के बड़े जानवरों की आमतौर पर कुत्ते, सूअर, ऊंट और गधे जैसे अन्य जानवरों द्वारा प्रशंसा की जाती है। एक व्यक्ति जो ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के बारे में सुनने के लिए अपने कान का उपयोग नहीं करता है, उसे खेत में छेद की तरह कान के छेद वाला माना जाना चाहिए। हालाँकि उस व्यक्ति की एक जीभ है, यह एक मेंढक की जीभ की तरह है, जो अनावश्यक रूप से क्रॉकिंग करके परेशानी पैदा करती है, जो मृत्यु के साँप को आमंत्रित करती है। इसी तरह, एक व्यक्ति जो न तो महान भक्तों के कमल चरणों की धूल का लाभ उठाता है और न ही भगवान् के कमल चरणों में चढ़ाए गए तुलसी के पत्तों की गंध लेता है, उसे मृत माना जाना चाहिए, भले ही वह माना जाता हो काम करना।"
इसी तरह, श्रीमद-भागवतम् 10.1.4 में कहा गया है:
निवृत्ततृष्णैरुपगीयमानाद्
भवौषधाज्छ्रोत्रमनोभिरामात्
क उत्तमश्लोकगुणानुवादा
त्पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात्
"पशु-हत्यारे या आत्मा के हत्यारे को छोड़कर कौन ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के गुणों के महिमामंडन को सुनने की परवाह नहीं करेगा? इस भौतिक संसार के दूषित होने से मुक्त व्यक्ति ऐसे महिमामंडन का आनंद लेते हैं।"
इसी तरह श्रीमद भागवतम् 3.23.56 में कहा गया है, न तीर्थपदसेवायै जीवन्नपि मृतॊ हि सः: "हालांकि एक व्यक्ति स्पष्ट रूप से जीवित है, अगर वह महान भक्तों के कमल चरणों की सेवा नहीं करता है तो उसे एक मृत शरीर माना जाना चाहिए।"
