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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  1.13.120 
मिश्र - वैष्णव, शान्त, अलम्पट, शुद्ध, दान्त,
धन - भोगे नाहि अभि मान ।
पुत्रेर प्रभावे यत, धन आ सि’ मिले, तत,
विष्णु - प्रीते द्विजे देन दान ॥120॥
 
 
अनुवाद
जगन्नाथ मिश्र एक आदर्श वैष्णव थे। वे शांतचित्त, इन्द्रिय-तृप्ति में संयमी, शुद्ध और संयमी थे। इसलिए उन्हें भौतिक ऐश्वर्य भोगने की कोई इच्छा नहीं थी। अपने दिव्य पुत्र के प्रभाव से जो भी धन प्राप्त होता, वे उसे विष्णु की संतुष्टि के लिए ब्राह्मणों को दान कर देते थे।
 
Jagannath Mishra was an ideal Vaishnav. He was calm, restrained in sense gratification, pure and restrained.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)