Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
जिस दिन माता-पिता स्नान करके प्रसूतिगृह से विदा हुए, उस दिन सीता ठाकुरणी ने उन्हें सभी प्रकार के आभूषण और वस्त्र प्रदान किए और फिर जगन्नाथ मिश्र का भी सत्कार किया। तब माता शचीदेवी और जगन्नाथ मिश्र द्वारा सम्मानित होकर सीता ठाकुरणी मन ही मन बहुत प्रसन्न हुईं और इस प्रकार वे घर लौट आईं।
On the day the mother and child bathed and left the maternity home, Sita Thakurani presented them with all kinds of jewelry and clothing and also honored Jagannath Mishra. Sita Thakurani was then deeply pleased by the honor bestowed by Mother Shachidevi and Jagannath Mishra and returned to her home.
तात्पर्य
बच्चे के जन्म के पाँचवे दिन, और नौवें दिन भी, माता गंगा या किसी अन्य पवित्र स्थल पर स्नान करती है। इसे निष्क्रमण कहते हैं, या प्रसूतिगृह से बाहर आने के समारोह को कहते हैं। आज के समय में प्रसूतिगृह अस्पताल हैं, किन्तु पहले हर सम्मानित घर में एक कक्ष प्रसूतिगृह के लिए अलग रखा जाता था जहाँ बच्चे को जन्म दिया जाता था और बच्चे के जन्म के नौवें दिन माता निष्क्रमण नामक समारोह में नियमित कक्षों में आती थी। दस पवित्रता-दीक्षा समारोहों में से निष्क्रमण एक है। पहले, विशेषकर बंगाल में, उच्च जातियाँ बच्चे के जन्म के बाद चार महीनों को एक प्रकार का एकांतवास माना करती थीं। चौथे माह के अंत में, माता सूर्योदय देख सकती थी। बाद में उच्च जातियों, जैसे कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ने एकांतवास को मात्र इक्कीस दिन माना, जबकि शूद्रों को तीस दिन का एकांतवास करना पड़ता था। करतभजा और सतीमा के रूप में जाने जाने वाले समाज के वर्गो के लिए, बच्चे की माता को एकांतवास के बाद सांकीर्तन में हरि-नृत्य, छोटे मीठे टुकड़े फेंककर, तुरंत पवित्र कर दिया जाता था। शचीदेवी और जगन्नाथ मिश्र, नवजात शिशु के साथ, सीता ठाकुरानी द्वारा सम्मानित किए गए थे। इसी प्रकार, सीता ठाकुरानी जब घर वापस लौट रही थीं, उन्हें भी शचीदेवी और जगन्नाथ मिश्र द्वारा सम्मानित किया गया था। बंगाल के सम्मानित परिवारों में यही प्रथा थी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥