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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  1.13.117 
दुर्वा, धान्य, दिल शीर्षे, कैल बहु आशीषे,
चिरजीवी हओ दुइ भाइ ।
डाकिनी - शाङ्खिनी हैते, शङ्का उपजिल चिते,
डरे नाम थुइल ‘निमाइ’ ॥117॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने नवजात शिशु के सिर पर ताज़ा घास और धान रखकर आशीर्वाद दिया और कहा, "आप लंबी आयु के हों।" लेकिन भूत और चुड़ैलों के डर से, उन्होंने बच्चे का नाम निमाई रखा।
 
He placed grass and grain on the newborn's head and blessed him with "Long life." However, fearing ghosts and witches, he named the child Nimai.
तात्पर्य
डॉकिनी और शाकिनी भगवान शिव और उनकी पत्नी की दो सहचरी हैं जिन्हें अत्यधिक अशुभ माना जाता है, क्योंकि ये प्रेत जीवन से जन्मी हैं। यह माना जाता है कि ऐसे अशुभ जीव नीम के पेड़ के पास नहीं जा सकते। कम से कम चिकित्सकीय रूप से यह स्वीकार किया जाता है कि नीम की लकड़ी अत्यधिक एंटीसेप्टिक होती है, और पहले अपने घर के सामने नीम का पेड़ रखने की प्रथा थी। भारत में बहुत बड़ी सड़कों पर, खासकर उत्तर प्रदेश में, सैकड़ों और हजारों नीम के पेड़ हैं। नीम की लकड़ी इतनी एंटीसेप्टिक होती है कि आयुर्वेदिक विज्ञान इसका उपयोग कुष्ठ रोग को ठीक करने के लिए करता है। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने नीम के पेड़ के सक्रिय सिद्धांत को निकाला है, जिसे मार्गोसिक एसिड कहा जाता है। नीम का उपयोग कई उद्देश्यों के लिए किया जाता है, खासकर दांतों को ब्रश करने के लिए। भारतीय गांवों में नब्बे प्रतिशत लोग इस उद्देश्य के लिए नीम की टहनियों का उपयोग करते हैं। नीम के पेड़ के सभी एंटीसेप्टिक प्रभावों के कारण और क्योंकि भगवान चैतन्य का जन्म एक नीम के पेड़ के नीचे हुआ था, सीता ठाकुरानी ने भगवान को निमाई नाम दिया। बाद में उनकी युवावस्था में उन्हें निमाई पंडित के रूप में मनाया जाता था, और पड़ोस के गांवों में उन्हें उसी नाम से बुलाया जाता था, हालांकि उनका असली नाम विश्वंभर था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)