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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  1.13.114 
दुर्वा, धान्य, गोरोचन, हरिद्रा, कुङ्कम, चन्दन ,
मङ्गल - द्रव्य पात्र भरिया ।
वस्त्र - गुप्त दोला चड़ि’ सङ्गे लजा दासी चेड़ी,
वस्त्रालङ्कार पेटारि भरिया ॥114॥
 
 
अनुवाद
कपड़े से ढकी पालकी में सवार होकर और दासियों के साथ, सीता ठाकुरणी जगन्नाथ मिश्र के घर आईं और अपने साथ ताज़ी घास, धान, गोरोचन, हल्दी, कुंकुम और चंदन जैसी अनेक शुभ वस्तुएँ लाईं। इन सभी भेंटों से एक बड़ी टोकरी भर गई।
 
Sita Thakurani arrived at Jagannath Mishra's house in a curtained palanquin, accompanied by her maids. She brought with her many auspicious substances: durva (sunflower grass), paddy, saffron, turmeric, kumkum (vermillion), and sandalwood. All these offerings were packed in a large box.
तात्पर्य
इस श्लोक में वस्त्र-गुप्ता डोला शब्दों का बहुत महत्त्व है। आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व भी कलकत्ते में प्रतिष्ठित स्त्रियाँ चार आदमियों द्वारा ढोये हुए पालकी पर सवार होकर ही किसी पड़ोस में जाती थीं। पालकी सफ़ेद सूती कपड़े से ढंकी होती थी जिससे उसमें बैठी हुई प्रतिष्ठित स्त्री को कोई देख न सके। प्रतिष्ठित परिवारों की विशेषकर स्त्रियाँ, सामान्य मनुष्यों की दृष्टि में नहीं आ सकती थीं। अब भी यह प्रथा दूर-दराज के गाँवों में प्रचलित है। संस्कृत का शब्द असूर्यपश्‍या यह सूचित करता है कि प्रतिष्ठित स्त्रियों को सूर्य की दृष्टि से भी बचा कर रखा जाता था। प्राग्य संस्कृति में यह प्रथा विशेष रूप से प्रचलित थी और हिन्दू व मुसलमान स्त्रियाँ, दोनों ही इसका पालन करती थीं। बचपन में हमने स्वयं अपनी माता को यह अनुभव किया है कि वह निमंत्रण पाकर भी अपने अगल-बगल के घरों में पैदल नहीं जाती थीं, अपितु गाड़ी या चार आदमियों से ढोयी जाने वाली पालकी द्वारा ही जाती थीं। पाँच सौ वर्ष पूर्व भी यह रीति विशेष रूप से प्रचलित थी और अद्वैत आचार्य की पत्नी प्रतिष्ठित स्त्री होने के कारण तत्कालीन समाज की प्रचलित रीतियों का विशेष रूप से पालन करती थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)