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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  1.13.113 
व्याघ्र - नख हेम - जड़ि, कटि - पट्टसूत्र - डोरी
हस्त - पदेर यत आभरण ।
चित्र - वर्ण पट्ट - साड़ी, बुनि फोतो पट्टपाड़ी,
स्वर्ण - रौप्य - मुद्रा बहु - धन ॥113॥
 
 
अनुवाद
सोने में जड़े बाघ के नाखून, रेशम और फीते से बनी कमर की सजावट, हाथों और पैरों के लिए आभूषण, सुंदर प्रिंट वाली रेशमी साड़ियाँ और रेशम से बना एक शिशु वस्त्र भी था। सोने और चाँदी के सिक्कों सहित कई अन्य कीमती चीज़ें भी शिशु को भेंट की गईं।
 
It included gold-studded claws, silk waistbands, hand and foot ornaments, beautifully printed silk saris, and a baby's silk dress. Gold and silver coins and other valuables were also offered to the child.
तात्पर्य
सीता ठाकुरानी द्वारा दिए गए उपहारों से, अद्वैत आचार्य की पत्नी यह प्रतीत होता है कि अद्वैत आचार्य उस समय अति धनी व्यक्ति थे। हालाँकि ब्राह्मण समाज के धनी लोग नहीं होते, किन्तु शान्तिपुर में ब्राह्मणों के नेता होने के कारण अद्वैत आचार्य बहुत अमीर थे। इसलिए उन्होंने शिशु भगवान चैतन्य महाप्रभु को बहुत से आभूषण दिये। परन्तु कमलाकांत विश्वास का जगन्नाथपुरी के राजा महाराज प्रतापरुद्र से तीन सौ रुपये माँगना, इस तर्क के साथ कि अद्वैत आचार्य उस धनराशि से कर्ज में थे, इस बात का संकेत देती है कि इतने धनी व्यक्ति जिस कई मूल्यवान आभूषण, साड़ियाँ आदि भेंट कर सकते थे, उन्हें तीन सौ रुपये चुकाना कठिन लगा। इसलिए उस समय एक रुपये का मूल्य आज के रुपये से हजारों गुणा अधिक था। आजकल कोई भी तीन सौ रुपये के कर्ज से घबराता नहीं, और न ही कोई साधारण व्यक्ति किसी मित्र के बेटे को भेंट करने के इतने मूल्यवान आभूषण जुटा सकता है। शायद उस ज़माने के तीन सौ रुपये का मूल्य आज के तीस हज़ार रुपये के बराबर होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)