श्रीवासेर ब्राह्मणी, नाम ताँर ‘मालिनी’,
आचार्यरत्नेर पत्नी - सङ्गे ।
सिन्दूर, हरिद्रा, तैल, खइ, कला, नारिकेल ,
दिया पूजे नारीगण रङ्गे ॥110॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
श्रीवास ठाकुर की पत्नी मालिनी, चन्द्रशेखर की पत्नी (आचार्यरत्न) तथा अन्य स्त्रियों के साथ, बड़ी प्रसन्नता से वहाँ आईं और उन्होंने सिन्दूर, हल्दी, तेल, चावल, केले और नारियल आदि से शिशु का पूजन किया।
Srivasa Thakur's wife Malini along with Chandrashekhar's (Acharyaratna) wife and other women came with great joy to worship the child with materials like vermilion, turmeric, oil, khaai (roasted rice), bananas and coconut.
तात्पर्य
सिंदूर, खाई (चूर्णित चावल), केले, नारियल और तेल में मिश्रित हल्दी ऐसे समारोह के लिए सभी शुभ उपहार हैं। जैसे कि फूला हुआ चावल होता है, उसी प्रकार चावल की एक अन्य तैयारी भी है जिसे खाई या चूर्णित चावल कहा जाता है, जिसे केले के साथ मिलकर एक बहुत ही शुभ प्रस्तुति के रूप में लिया जाता है। साथ ही, तेल और सिंदूर के साथ मिश्रित हल्दी एक शुभ मरहम बनाती है जिसे नवजात शिशु या शादी करने वाले व्यक्ति के शरीर पर मला जाता है। ये सभी पारिवारिक मामलों में शुभ कार्य हैं। हम देखते हैं कि पाँच सौ साल पहले भगवान चैतन्य महाप्रभु के जन्म के समय ये सभी समारोह सख्ती से किए जाते थे, लेकिन आजकल इस तरह के अनुष्ठानिक प्रदर्शन शायद ही कभी होते हैं। आमतौर पर एक गर्भवती माँ को अस्पताल भेजा जाता है, और जैसे ही उसके बच्चे का जन्म होता है उसे एंटीसेप्टिक से धोया जाता है, और इसी के साथ सब कुछ समाप्त हो जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥