श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 13: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  1.13.100 
देखि’ उपराग हा सि’, शीघ्र गङ्गा - घाटे आ सि’
आनन्दे करिल गङ्गा - स्नान ।
पाञा उपराग - छले, आपनार मनो - बले,
ब्राह्मणेरे दिल नाना दान ॥100॥
 
 
अनुवाद
चंद्रग्रहण देखकर और हँसते हुए, अद्वैत आचार्य और हरिदास ठाकुर तुरंत गंगा तट पर गए और बड़े हर्ष से नदी में स्नान किया। चंद्रग्रहण के अवसर का लाभ उठाकर, अद्वैत आचार्य ने अपनी मानसिक शक्ति से ब्राह्मणों को नाना प्रकार के दान वितरित किए।
 
Watching the lunar eclipse and laughing, Advaita Acharya and Haridasa Thakura immediately went to the banks of the Ganges and bathed in it with great joy. Taking advantage of the lunar eclipse, Advaita Acharya, using his mental power, gave various donations to the Brahmins.
तात्पर्य
हिंदुओं में चंद्र या सूर्य ग्रहण के समय अधिक से अधिक दान करने की प्रथा है । इसलिए अद्वैत आचार्य ने इस ग्रहण का लाभ उठाते हुए ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिये । श्रीमद् भगवтам (10. 3. 11) में यह कथन है कि जब कृष्ण का जन्म हुआ, उस समय वसुदेव ने अवसर का लाभ उठाकर दस हज़ार गायें ब्राह्मणों को दान कर दीं । हिंदुओं में यह प्रथा है कि बच्चा पैदा होने पर, खासकर लड़का पैदा होने पर, माता पिता हर्षोल्लास में बड़ा दान करते हैं । अद्वैत आचार्य इसलिये दान देने में रुचि रखते थे कि चंद्र ग्रहण के समय भगवान चैतन्य का जन्म हुआ था । किन्तु लोग यह समझ नहीं पाए कि अद्वैत आचार्य इतने प्रकार की वस्तुएँ दान क्यों कर रहे थे । उन्होंने चंद्र ग्रहण के कारण नहीं वरन् उस समय भगवान के जन्म लेने के कारण दान किया था । उन्होंने दान उसी प्रकार किया जैसे वसुदेव ने भगवान कृष्ण के प्रकट होने के समय किया था ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)