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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  1.12.87 
अमोघ पण्डित, हस्ति - गोपाल, चैतन्य - वल्लभ ।
यदु गाङ्गुलि आर मङ्गल वैष्णव ॥87॥
 
 
अनुवाद
अट्ठाईसवीं शाखा अमोघ पंडित थी; उनतीसवां, हस्तिगोपाल; तीसवाँ, चैतन्य-वल्लभ; इकतीसवाँ, यदु गांगुली; और बत्तीसवां, मंगला वैष्णव।
 
The twenty-eighth branch was Amogha Pandit, the twenty-ninth was Hastigopal, the thirtieth was Chaitanya Vallabh, the thirty-first was Yadu Ganguly and the thirty-second was Mangal Vaishnav.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपने अनुभाष्य में लिखा है, "श्री मंगल वैष्णव मुर्शिदाबाद जिले के टिटिकाणा गाँव के निवासी थे। उनके पूर्वज शाक्त थे जो देवी कीरीटेश्वरी की पूजा करते थे। ऐसा कहा जाता है कि मंगल वैष्णव, जो पहले एक कट्टर ब्रह्मचारी थे, उन्होंने घर छोड़ दिया और बाद में अपने शिष्य प्राणनाथ अधिकारी की बेटी से मयानाडाला गाँव में शादी की। इस परिवार के वंशज कांडडा के ठाकुर के नाम से जाने जाते हैं, जो कटवा के पास बर्दवान जिले का एक गाँव है। मंगल वैष्णव के बिखरे हुए वंशज, कुल छत्तीस परिवार, अभी भी वहाँ रहते हैं। मंगल ठाकुर के प्रसिद्ध शिष्यों में प्राणनाथ अधिकारी, कांडडा गाँव के पुरुषोत्तम चक्रवर्ती और नृसिंह-प्रसाद मित्र हैं, जिनके परिवार के सदस्य प्रसिद्ध मृदंग वादक हैं। सुधाकृष्ण मित्र और निकुंजबिहारी मित्र दोनों विशेष रूप से प्रसिद्ध मृदंग वादक हैं। पुरुषोत्तम चक्रवर्ती के परिवार में कुंजबिहारी चक्रवर्ती और राधावल्लभ चक्रवर्ती जैसे प्रसिद्ध व्यक्ति हैं, जो अब बीरभूम जिले में रहते हैं। वे पेशेवर रूप से चैतन्य-मंगल के गीत सुनाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब मंगल ठाकुर बंगाल से जगन्नाथ पुरी तक एक सड़क का निर्माण कर रहे थे, तो उन्हें एक झील खोदते समय राधावल्लभ की एक मूर्ति मिली। उस समय वह कांडडा की इलाके में, राणिपुरा नामक गाँव में रह रहे थे। मंगल ठाकुर द्वारा व्यक्तिगत रूप से पूजा की जाने वाली शालग्राम-शिला अभी भी कांडडा गाँव में मौजूद है। वहां वृंदावन-चंद्र की पूजा के लिए एक मंदिर बनाया गया है। मंगल ठाकुर के तीन पुत्र थे - राधिकाप्रसाद, गोपीरमण और श्यामकिशोर। इन तीनों पुत्रों के वंशज आज भी जीवित हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)