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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  1.12.86 
श्रीहर्ष, रघु - मिश्र, पण्डित लक्ष्मीनाथ ।
बङ्गवाटी - चैतन्य - दास, श्री - रघुनाथ ॥86॥
 
 
अनुवाद
तेईसवीं शाखा श्रीहर्ष, चौबीसवीं रघुमिश्र, पच्चीसवीं लक्ष्मीनाथ पंडित, छब्बीसवीं बंगवती चैतन्यदास और सत्ताईसवीं रघुनाथ थे।
 
Shri Harsha was the twenty-third branch, Raghu Mishra was the twenty-fourth, Lakshminath Pandit was the twenty-fifth, Bangwati Chaitanya Das was the twenty-sixth and Raghunath was the twenty-seventh branch.
तात्पर्य
गौर-गणोद्देश-दीपिका(१९५ और २०१) में रघु मिश्र का वर्णन कार्पूर-मंजरी के रूप में है। इसी तरह, लक्ष्मीनाथ पंडिता को रसोनमादा के रूप में उल्लेखित किया गया है और बंगवाटी चैतन्य दास को काली के रूप में उल्लेख किया गया है। शाखा-निर्णय में कहा गया है कि बंगवाटी चैतन्य दास को हमेशा आँखों में आँसू भरे देखे जाते थे। उनकी संतानों की एक शाखा भी थी। उनके नाम थे मथुराप्रसाद, रुक्मिणीकांत, जीवनकृष्ण, युगलकिशोर, रत्नकृष्ण, राधामाधव, ऊषामणि, वैकुंठनाथ और लालमोहन या लालमोहन शाहा शंखनिधि। लालमोहन ढाका शहर का एक महान व्यापारी था। गौर-गणोद्देश-दीपिका (१९४ और २००) में उल्लेख किया गया है कि रघुनाथ पहले वरांगडा थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)