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अनुवाद
पंद्रहवीं शाखा श्रीनाथ चक्रवर्ती, सोलहवीं उद्धव, सत्रहवीं जितमित्र और अठारहवीं जगन्नाथ दास थे।
Srinath Chakraborty was the fifteenth, Uddhav was the sixteenth, Jitamitra was the seventeenth and Jagannath Das was the eighteenth.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर अपने अनुभाष्य में लिखते हैं, "शाखा निर्णय, श्लोक 13 में श्रीनाथ चक्रवर्ती को सभी अच्छे गुणों के भंडार और भगवान कृष्ण की सेवा में निपुण बताया गया है। इसी प्रकार, श्लोक 35 में उद्धवदास को सभी को भगवद्प्रेम बांटने में अत्यधिक योग्य बताया गया है। गौर-गणोद्देश-दीपिका (202) में जीतामित्र को श्यामा-मंजरी नाम की गोपी के रूप में उल्लेखित किया गया है। जीतामित्र ने कृष्ण-मायूर नामक एक पुस्तक लिखी। जगन्नाथ दास ढाका के निकट विक्रमपुर के निवासी थे। उनका जन्मस्थान काष्ठकाटा अथवा काठदिया नामक गाँव था। उनके वंशज अब आडियाला, कामारपाड़ा और पैकापाड़ा नामक गाँवों में निवास करते हैं। उन्होंने यशोमाधव का एक मंदिर स्थापित किया। इस मंदिर में उपासक आडियाला के गोस्वामी हैं। चौंसठ सखियों में से एक के रूप में, वह पहले चित्रादेवी-गोपी की एक सहायक तिलकिनी नाम की थीं। उनके वंशजों की सूची निम्नलिखित है: रामनृसिंह, रामगोपाल, रामचंद्र, सनातन, मुक्ता राम, गोपीनाथ, गोलोक, हरिमोहन शिरोमणि, रखालराज, माधव और लक्ष्मीकांत। शाखा-निर्णय में उल्लेख किया गया है कि जगन्नाथ दास ने त्रिपुरा जिले या राज्य में हरे कृष्ण आंदोलन का प्रचार किया था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥