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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.12.81 
अनन्त आचार्य, कविदत्त, मिश्र - नयन ।
गङ्गामन्त्री मामु ठाकुर, कण्ठाभरण ॥81॥
 
 
अनुवाद
पाँचवीं शाखा अनन्ताचार्य, छठी शाखा कवि दत्त, सातवीं नयन मिश्र, आठवीं गंगामन्त्री, नौवीं मामू ठाकुर और दसवीं कंठभरण थे।
 
The fifth branch was Anant Acharya, the sixth was Kavidatta, the seventh was Nayan Mishra, the eighth was Gangamantri, the ninth was Mamu Thakur and the tenth branch was Kanthabharana.
तात्पर्य
गौरा-गणोद्देश-दीपिका के 197 और 207वें लेख में कवि दत्त को कालकण्ठी नामक गोपी के रूप में वर्णित किया है, 196वें और 207वें लेख में नयन मिश्र को नित्य-मंजरी नामक गोपी के रूप में वर्णित किया है और 196 और 205वें लेख में गंगामंत्री को चंद्रिका नामक गोपी के रूप में वर्णित किया है। ममू ठाकुर, जिसका असली नाम जगन्नाथ चक्रवर्ती था, श्री नीलांबर चक्रवर्ती, श्री चैतन्य महाप्रभु के दादा का भतीजा था। बंगाल में मामा को मामा कहा जाता है और पूर्वी बंगाल और उड़ीसा में मामू। इस प्रकार जगन्नाथ चक्रवर्ती को मामू या मामू ठाकुर के नाम से जाना जाता था। मामू ठाकुर का निवास फरीदपुर जिले में, मगड़ोवा नामक गांव में था। श्री गदाधर पंडित के निधन के बाद, मामू ठाकुर जगन्नाथ पुरी में टोटा-गोपीनाथ नामक मंदिर के प्रभारी पुजारी बन गए। कुछ वैष्णवों की राय के अनुसार, मामू ठाकुर पहले श्री रूप-मंजरी के नाम से जाने जाते थे। मामू ठाकुर के अनुयायी रघुनाथ गोस्वामी, रामचंद्र, राधावल्लभ, कृष्णजीवन, श्यामसुंदर, शांतामणि, हरिनाथ, नवीनाचंद्र, मतिलाल, दयामाई और कुंजबिहारी थे।

कण्ठाभरण, जिसका मूल नाम श्री अनंत चट्टराज था, कृष्ण-लीला में गोपाली नामक गोपी थी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)