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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.12.8 
प्रथमे त’ एक - मत आचार्येर गण ।
पाछे दुइ - मत हैल दैवेर कारण ॥8॥
 
 
अनुवाद
पहले तो अद्वैत आचार्य के सभी अनुयायी एक ही मत रखते थे, लेकिन बाद में ईश्वरीय विधान के अनुसार, वे दो भिन्न मतों का पालन करने लगे।
 
Initially, all the followers of Advaita Acharya believed in the same sect, but later they coincidentally started following two different sects.
तात्पर्य
दैवरा कारण शब्द दर्शाते हैं कि ईश्वरीय प्रबंध या भगवान की इच्छा से अद्वैत आचार्यके शिष्यगण दो दलों में विभक्त हो गये। एक आचार्य के शिष्यों में यह अमतै--की गई है, वह गौड़ीय मठ के सदस्यों में भी पायी जाती है। आरम्भ में श्री श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद, ओं विष्णुपाद परमहंस परिव्राजकाचार्य अष्टोत्तर-शत के सान्निध्यकाल में सभी शिष्यगण संगठित होकर कार्य करते थे लेकिन ठाकुर के विष्णुपद-गमन के तुरन्त बाद ही उनमें मतभेद हो गया। एक दल ने भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के निर्देशों का तार्किक पालन किया। किन्तु एक अन्य दल ने उनकी इच्छाओं के अनुपालन के नाम पर अपनी मनमानी रची। भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने अपने प्रस्थान काल में अपने सम्पूर्ण शिष्यगणों से एक शासकीय संस्था बनाकर सयुक्ति रूप से प्रचारकार्य करने का अनुरोध किया था। उन्होंने किसी विशेष व्यक्ति को ही अपना उत्तराधिकारी आचार्य बनाने का निर्देश नहीं दिया था। लेकिन ठाकुर के विष्णुपदगमन के तुरन्त बाद ही उनके प्रमुख सचिवों ने बिना किसी अधिकार के आचार्य-पद पर अधिकार करने की योजना बनाई और इसी को लेकर वे दो दलों में विभक्त हो गए। तत्पश्चात् दोनों ही दल निरर्थक हो गये क्योंकि वे आचार्य के निर्देशों का पालन नहीं कर सके और उनका कोई अधिकार भी नहीं था। गौड़ीय मठ में एक शासकीय संस्था की स्थापना करके प्रचार-कार्य करने के आचार्य के निर्देश के होते हुए भी, बिना किसी अधिकार के दोनों दलों ने मुकदमा चलाना आरम्भ कर दिया जो कि चालीस वर्षों से भी अधिक समय तक चला, किन्तु उसका कोई निर्णय नहीं हो सका।

इसलिए हम किसी भी दल के नहीं हैं। किन्तु दो दलों के बीच गौड़ीय मठ की सम्पत्ति के बँटवारे के कारण प्रचार कार्य बन्द हो गया। हमने भक्तिविनोद ठाकुर और भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के मिशन को अपनाया और सभी पूर्ववर्ती आचार्यों की छाया में और समस्त विश्व में चैतन्य महाप्रभु के मत का प्रचार किया और हमने देखा कि हमारा यह नम्र प्रयास सफल हुआ है। हमने विशेष रूप से श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के भगवद्गीता पर उनके निजभाष्य के प्रारम्भ में ‘व्यवसायार्थिका बुद्धिरेकेह कुरु नन्दन’ इस श्लोक पर टीका में वर्णित सिद्धान्तों का ही अनुसरण किया है। विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के इस निर्देश के अनुसार शिष्यका यह कर्तव्य है कि वह अपने आचार्य के निर्देशों का तार्किक पालन करे। आध्यात्मिक जीवन में उन्नति का वास्तविक रहस्य शिष्य के अपने गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा ही है। वेद यह बात पुष्टि करते हैं -

यस्य देवे परा भक्तिस्तथा देवे तथा गुरौ ।

तस्यैते कथिता ह्यर्था:प्रकाशते महात्मन: ।।

“जिसके हृदय में आध्यात्मिक गुरु और भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा है, उसी को वेद ज्ञान के रहस्य का उद्घाटन होता है।“ श्री कृष्ण चैतन्य आन्दोलन इसी सिद्धान्त पर आधारित है और इसलिए यह हमारा प्रचार कार्य सफलतापूर्वक चल रहा है। प्रतिकूल राक्षसों द्वारा अनेकों बाधाओं के रहते हुए भी हमें अपने पूर्ववर्ती आचार्यों से अच्छी सहायता मिल रही है। प्रत्येक कार्य का निर्णय उसके परिणाम से ही होता है। स्वयं नियुक्त आचार्य के दल के सदस्य, जो गौड़ीय मठ की सम्पत्ति पर कब्जा किये हुए हैं, वे सब संतुष्ट हैं परन्तु उनका प्रचार-कार्य कुछ भी नहीं चल पा रहा है। इसलिए उनके कार्यों के परिणाम से ही यह समझ में आ रहा है कि वे सब निरर्थक हैं जबकि गुरु और गौरांग का तार्किक रूप से पालन करने वाली अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संस्था, इस्कॉन का प्रचार कार्य विश्व में प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर möglichst अधिक सँख्या में पुस्तकों का प्रकाशन कराके उन्हें विश्व के हर कोने में वितरित करना चाहते थे। हमने इस सम्बन्ध में भी अपनी पूरी शक्ति लगा रखी है और हम अपनी आशा से भी अधिक परिणाम देख रहे हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)