इसलिए हम किसी भी दल के नहीं हैं। किन्तु दो दलों के बीच गौड़ीय मठ की सम्पत्ति के बँटवारे के कारण प्रचार कार्य बन्द हो गया। हमने भक्तिविनोद ठाकुर और भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के मिशन को अपनाया और सभी पूर्ववर्ती आचार्यों की छाया में और समस्त विश्व में चैतन्य महाप्रभु के मत का प्रचार किया और हमने देखा कि हमारा यह नम्र प्रयास सफल हुआ है। हमने विशेष रूप से श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के भगवद्गीता पर उनके निजभाष्य के प्रारम्भ में ‘व्यवसायार्थिका बुद्धिरेकेह कुरु नन्दन’ इस श्लोक पर टीका में वर्णित सिद्धान्तों का ही अनुसरण किया है। विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के इस निर्देश के अनुसार शिष्यका यह कर्तव्य है कि वह अपने आचार्य के निर्देशों का तार्किक पालन करे। आध्यात्मिक जीवन में उन्नति का वास्तविक रहस्य शिष्य के अपने गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा ही है। वेद यह बात पुष्टि करते हैं -
यस्य देवे परा भक्तिस्तथा देवे तथा गुरौ ।
तस्यैते कथिता ह्यर्था:प्रकाशते महात्मन: ।।
“जिसके हृदय में आध्यात्मिक गुरु और भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा है, उसी को वेद ज्ञान के रहस्य का उद्घाटन होता है।“ श्री कृष्ण चैतन्य आन्दोलन इसी सिद्धान्त पर आधारित है और इसलिए यह हमारा प्रचार कार्य सफलतापूर्वक चल रहा है। प्रतिकूल राक्षसों द्वारा अनेकों बाधाओं के रहते हुए भी हमें अपने पूर्ववर्ती आचार्यों से अच्छी सहायता मिल रही है। प्रत्येक कार्य का निर्णय उसके परिणाम से ही होता है। स्वयं नियुक्त आचार्य के दल के सदस्य, जो गौड़ीय मठ की सम्पत्ति पर कब्जा किये हुए हैं, वे सब संतुष्ट हैं परन्तु उनका प्रचार-कार्य कुछ भी नहीं चल पा रहा है। इसलिए उनके कार्यों के परिणाम से ही यह समझ में आ रहा है कि वे सब निरर्थक हैं जबकि गुरु और गौरांग का तार्किक रूप से पालन करने वाली अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संस्था, इस्कॉन का प्रचार कार्य विश्व में प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर möglichst अधिक सँख्या में पुस्तकों का प्रकाशन कराके उन्हें विश्व के हर कोने में वितरित करना चाहते थे। हमने इस सम्बन्ध में भी अपनी पूरी शक्ति लगा रखी है और हम अपनी आशा से भी अधिक परिणाम देख रहे हैं।
