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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  1.12.73 
ये ये लैल श्री - अच्युतानन्देर मत ।
सेइ आचार गण - महा - भागवत ॥73॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य के वंशज जिन्होंने श्री अच्युतानन्द का मार्ग स्वीकार किया, वे सभी महान भक्त थे।
 
The descendants of Advaita Acharya who followed the path of Sri Achyutananda all became great devotees.
तात्पर्य
इस संबंध में श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने अपने अमृत-प्रवाह-भाष्य में यह संक्षिप्त नोट दिया है: "श्री अद्वैत आचार्य भक्ति-कल्पतरु के महत्वपूर्ण तनों में से एक है, जो भक्ति सेवा की इच्छा वृक्ष है। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक माली की तरह भक्ति वृक्ष की जड़ पर पानी डाला और इस तरह उसके सभी तने और शाखाओं को पोषित किया। लेकिन फिर भी माया, एक जीवित इकाई की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति, के जादू के तहत, कुछ शाखाओं ने पानी डालने वाले माली को स्वीकार न करते हुए, तने को महान भक्ति-कल्पतरु का एकमात्र कारण माना। दूसरे शब्दों में, अद्वैत आचार्य की शाखाएं या वंशज जो अद्वैत आचार्य को भक्ति लता का मूल कारण मानते थे, और जिन्होंने इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों की उपेक्षा की या अवज्ञा की, उन्होंने खुद को पानी पिलाए जाने के प्रभाव से वंचित कर लिया और इस तरह सूखकर मर गए। यह आगे समझा जाना चाहिए कि केवल अद्वैत आचार्य के भ्रमित वंशज ही नहीं, बल्कि कोई भी जो चैतन्य महाप्रभु से कोई संबंध नहीं रखता है - भले ही वह स्वतंत्र रूप से एक महान संन्यासी, विद्वान विद्वान या तपस्वी है - एक पेड़ की मृत शाखा की तरह है।"

श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी के बयानों का समर्थन करते हुए श्री भक्तिविनोद ठाकुर के इस विश्लेषण ने वर्तमान तथाकथित हिंदू धर्म की स्थिति को दर्शाया है, जो मुख्य रूप से मायावाद दर्शन द्वारा संचालित होने के कारण विभिन्न गढ़े हुए विचारों का एक मेधावी संस्थान बन गया है। मायावादी कृष्ण चेतना आंदोलन से बहुत डरते हैं और उस पर हिंदू धर्म को खराब करने का आरोप लगाते हैं क्योंकि यह दुनिया के सभी हिस्सों और सभी धार्मिक संप्रदायों के लोगों को स्वीकार करता है और उन्हें वैज्ञानिक रूप से दैव-वर्णाश्रम-धर्म में शामिल करता है। हालाँकि, जैसा कि हमने कई बार समझाया है, हमें वैदिक साहित्य में "हिंदू" जैसा कोई शब्द नहीं मिलता है। यह शब्द सबसे अधिक संभावना अफगानिस्तान से आया है, जो एक मुख्य रूप से मुस्लिम देश है, और मूल रूप से अफगानिस्तान में हिंदुकुश नामक एक दर्रे को संदर्भित करता है, जो अभी भी भारत और विभिन्न मुस्लिम देशों के बीच एक व्यापार मार्ग का एक हिस्सा है।

धर्म की वास्तविक वैदिक प्रणाली को वर्णाश्रम-धर्म कहा जाता है, जैसा कि विष्णु पुराण में पुष्टि की गई है:

वर्णाश्रमाचार-वता पुरुषेण परः पुमान्

विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोष-कारणम्

(विष्णु पुराण 3.8.9)

वैदिक साहित्य अनुशंसा करता है कि मनुष्य वर्णाश्रम-धर्म के सिद्धांतों का पालन करे। वर्णाश्रम-धर्म की प्रक्रिया को स्वीकार करने से मनुष्य का जीवन सफल होगा क्योंकि यह उसे भगवान के साथ जोड़ेगा, जो मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसलिए कृष्ण चेतना आंदोलन मानवता के लिए है। यद्यपि मानव समाज के विभिन्न खंड या उपखंड होते हैं, सभी मनुष्य एक ही प्रजाति के होते हैं, और इसलिए हम स्वीकार करते हैं कि वे सभी भगवान के साथ अपने संवैधानिक संबंध को समझने की क्षमता रखते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु पुष्टि करते हैं, जीवेर 'स्वरूप' हया - कृष्णेर नित्य-दास: "प्रत्येक जीवित इकाई भगवान का एक शाश्वत हिस्सा, एक शाश्वत सेवक है।" प्रत्येक जीवित इकाई जो मानव रूप प्राप्त करती है वह अपनी स्थिति के महत्व को समझ सकती है और इस तरह भगवान कृष्ण के भक्त बनने की पात्र बन सकती है। इसलिए हम मानते हैं कि सभी मानवता को कृष्ण चेतना में शिक्षित किया जाना चाहिए। वास्तव में, दुनिया के सभी हिस्सों में, हर देश में जहां हम संकीर्तन आंदोलन का प्रचार करते हैं, हम पाते हैं कि लोग बिना किसी हिचकिचाहट के हरि कृष्ण महामंत्र को बहुत आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। इस जप का दृश्यमान प्रभाव यह है कि हरि कृष्ण आंदोलन के सदस्य, उनकी पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, पापपूर्ण जीवन के चार सिद्धांतों को त्याग देते हैं और भक्ति के एक उच्च स्तर पर आ जाते हैं।

हिंदू धर्म का अनुसरण करने वालों के महान विद्वान होने, तपस्वी, गृहस्थियों और स्वामियों के रूप में प्रस्तुत करते है, वे सब निरर्थक है, वैदिक धर्म की सूखी हुई शाखाएँ हैं। उनमें कोई सामर्थ नहीं है; वे मानव समाज के लाभ के लिए वैदिक संस्कृति का प्रसार करने के लिए कुछ नहीं कर सकते हैं। वैदिक संस्कृति का सार श्री चैतन्य महाप्रभु का संदेश है। भगवान चैतन्य ने निर्देश दिया:

यारे देख, तारे कह ‘कृष्ण’ उपदेश

आमार अज्ञाय गुरु हाँ तार’ एइ देश

(च. च मझ्य 7.128)

किसी को भी जो मिले, उसे कृष्ण-कथा के सिद्धांतों के बारे में निर्देश दे, जैसा कि भगवद-गीता और श्रीमद-भागवतम में व्यक्त किया गया है। जिसकी कृष्ण-कथा या श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ में कोई रुचि नहीं है, वह एक सूखी, बेकार लकड़ी की तरह है जिसमें कोई जीवंत शक्ति नहीं होती है। ISKCON शाखा, श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सीधे तौर पर सिंचित होने के कारण, निस्संदेह सफल हो रही है, जबकि तथाकथित हिंदू धर्म की विच्छिन्न शाखाएँ जो ISKCON से ईर्ष्या करती हैं, सूख रही हैं और मर रही हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)