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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.12.66 
मालि - दत्त जल अद्वैत - स्कन्ध योगाय ।
सेइ जले जीये शाखा, - फुल - फल पाय ॥66॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य शाखा को मूल माली श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रदत्त जल प्राप्त हुआ। इस प्रकार, उपशाखाएँ पोषित हुईं और उनके फल-फूल प्रचुर मात्रा में उगे।
 
Advaita Acharya's branch received water from the original gardener, Sri Chaitanya Mahaprabhu. Thus, the sub-branches were nurtured and bore abundant fruit and flowers.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा आपूर्ति किए गए जल द्वारा पोषित अद्वैत आचार्य की शाखाओं को ही सच्चे आचार्यों के रूप में माना जाना चाहिए। जैसा कि हमने पहले चर्चा की, अद्वैत आचार्य के प्रतिनिधि बाद में दो समूहों में बंट गए - आचार्य के शिष्य-परंपरा की सच्ची शाखाएँ और अद्वैत आचार्य की दंभपूर्ण शाखाएँ। वे जो चैतन्य महाप्रभु के सिद्धांतों का पालन करते थे, वे बढ़े-फूले, जबकि अन्य, जिनका वर्णन नीचे साठवें-सातवें छंद में किया गया है, सूख गए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)