प्रतिग्रह कभु ना करिबे राज - धन ।
विषयीर अन्न खाइले दुष्ट हय मन ॥50॥
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अनुवाद
“अद्वैत आचार्य, मेरे आध्यात्मिक गुरु को कभी भी धनवानों या राजाओं से दान स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि कोई आध्यात्मिक गुरु ऐसे भौतिकवादियों से धन या अनाज स्वीकार करता है, तो उसका मन दूषित हो जाता है।
My guru Advaita Acharya should never accept donations from rich men or kings, because if a guru accepts money or food from such materialists, his mind becomes polluted.
तात्पर्य
भौतिकवादी व्यक्तियों से धन या भोजन स्वीकार करना बहुत जोखिम भरा होता है क्योंकि इस तरह की स्वीकृति दान प्राप्त करने वाले के दिमाग को प्रदूषित कर देती है। वैदिक व्यवस्था के अनुसार, किसी को संन्यासियों और ब्राह्मणों को दान देना चाहिए क्योंकि जो इस तरह दान देता है वह पापपूर्ण गतिविधियों से मुक्त हो जाता है। इसलिए, पहले ब्राह्मण किसी व्यक्ति से तब तक दान स्वीकार नहीं करते थे जब तक कि वह बहुत पवित्र न हो। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने सभी आध्यात्मिक गुरुओं के लिए यह निर्देश दिया था। भौतिकवादी व्यक्ति जो अवैध यौन संबंध, नशा, जुआ और मांसाहार जैसी अपनी पापपूर्ण गतिविधियों को छोड़ने के लिए इच्छुक नहीं हैं, कभी-कभी हमारे शिष्य बनना चाहते हैं, लेकिन पेशेवर आध्यात्मिक गुरुओं के विपरीत जो अपनी स्थिति की परवाह किए बिना शिष्यों को स्वीकार करते हैं, वैष्णव ऐसे सस्ते शिष्यों को स्वीकार नहीं करते हैं। एक वैष्णव आचार्य किसी शिष्य को स्वीकार करने से पहले उसे कम से कम किसी शिष्य के लिए नियमों और विनियमों का पालन करने के लिए सहमत होना चाहिए। वास्तव में, एक वैष्णव को उन लोगों से दान या भोजन भी स्वीकार नहीं करना चाहिए जो वैष्णव सिद्धांतों के नियमों और विनियमों का पालन नहीं करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥