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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  1.12.49 
प्रभु कहे - बाउलिया, ऐछे काहे कर।
आचार्येर लज्जा - धर्म - हानि से आचर ॥49॥
 
 
अनुवाद
भगवान चैतन्य महाप्रभु ने कमलाकांत को निर्देश दिया, "तुम एक बौलिया हो, जो चीज़ों को उनके वास्तविक रूप में नहीं जानते। तुम ऐसा व्यवहार क्यों करते हो? तुम अद्वैत आचार्य की निजता का उल्लंघन क्यों करते हो और उनके धार्मिक सिद्धांतों को क्यों क्षति पहुँचाते हो?"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu explained to Kamalakanta, "You are a Bauliya, who does not know the true state of things. Why do you behave like this? Why do you violate the confidentiality of the Advaita Acharya and harm his religious principles?"
तात्पर्य
कमलाकांत विश्वास ने अपनी अज्ञानता के चलते जगन्नाथपुरी के राजा महाराजा प्रतापरुद्र से अनुरोध किया कि वे अद्वैताचार्य के तीन सौ रुपए के ऋण का भुगतान कर दें। पर साथ ही उन्होंने अद्वैताचार्य को भगवान के अवतार के रूप में स्थापित किया। यह विरोधाभासी है। भगवान का अवतार इस भौतिक दुनिया में किसी का ऋणी नहीं रह सकता। चैतन्य महाप्रभु ऐसे विरोधाभास से कभी संतुष्ट नहीं होते हैं, जिसे तकनीकी रूप से रसाभास कहा जाता है यानी एक भावना (रस) का दूसरी भावना से जुड़ना। यह विचार उसी प्रकार का है जैसे कि यह विरोधाभास है कि नारायण दरिद्र हैं (दारिद्र-नारायण)।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)