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अनुवाद
“जब भगवान चैतन्य ने मुझे दंडित किया, तो मुझे श्री मुकुंद को दिए गए दंड के समान दंड पाकर बहुत खुशी हुई।
“After being tortured by Chaitanya Mahaprabhu, I felt extremely happy that I too had received the same punishment as Sri Mukunda.”
तात्पर्य
श्री मुकुंद, जो कि भगवान चैतन्य महाप्रभु के घनिष्ठ मित्र और सहयोगी थे, वे अक्सर उन जगहों पर जाते थे जहां लोग वैष्णव पंथ के विरोधी थे। जब भगवान चैतन्य महाप्रभु को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने मुकुंद को दंडित किया और उन्हें फिर से अपने दर्शन करने से मना कर दिया। यद्यपि चैतन्य महाप्रभु फूल की तरह कोमल थे, परंतु वे वज्र की तरह कठोर भी थे और हर कोई मुकुंद को श्री चैतन्य महाप्रभु के समक्ष फिर से आने की अनुमति देने से डरता था। इसलिए, मुकुंद बहुत दुखी होकर अपने दोस्तों से पूछते थे कि क्या उन्हें कभी भगवान चैतन्य महाप्रभु के दर्शन करने की अनुमति मिलेगी। जब भक्तों ने यह पूछताछ भगवान चैतन्य के सामने रखी, तो भगवान ने उत्तर दिया, "लाखों वर्षों के बाद मुकुंद को मुझे देखने की अनुमति मिलेगी।" जब उन्होंने यह सूचना मुकुंद को दी, तो वे खुशी से नाच उठे, और जब भगवान चैतन्य महाप्रभु ने सुना कि मुकुंद लाखों वर्षों बाद भी उनसे मिलने के लिए इतने धैर्यपूर्वक इंतजार कर रहे थे, तो उन्होंने तुरंत उन्हें लौट आने को कहा। चैतन्य-भागवत, मध्य-खंड, दसवें अध्याय में मुकुंद को दिए गए इस दंड के बारे में एक कथन है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥