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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.12.40 
मुक्ति - श्रेष्ठ क रि’ कैनु वाशिष्ठ व्याख्यान ।
क्रुद्ध हवा प्रभु मोरे कैल अपमान ॥40॥
 
 
अनुवाद
"इस प्रकार मैंने योग-वाशिष्ठ की व्याख्या की, जो मोक्ष को जीवन का अंतिम लक्ष्य मानता है। इसके कारण भगवान मुझ पर क्रोधित हुए और मेरे साथ स्पष्ट रूप से अनादरपूर्ण व्यवहार किया।
 
“I interpreted the Yoga Vasishtha, a text that considers liberation as the ultimate goal of life, and therefore the Lord became angry with me and showed me superficial disrespect.”
तात्पर्य
एक पुस्तक है जिसका नाम योग-वासिष्ठ है जिसे मायावादी बहुत अधिक पसंद करते हैं क्योंकि यह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के बारे में अवैयक्तिक गलतफहमियों से भरा है, जिसमें वैष्णववाद का कोई स्पर्श नहीं है। तथ्य यह है कि सभी वैष्णवों को ऐसी पुस्तक से बचना चाहिए, लेकिन अद्वैत आचार्य प्रभु, भगवान से दंड चाहते हैं, ने योग-वासिष्ट की अवैयक्तिक बातों का समर्थन करना शुरू कर दिया। इस प्रकार भगवान चैतन्य महाप्रभु उस पर अत्यधिक क्रोधित हो गए और प्रतीत होता है कि उसके साथ अपमानजनक व्यवहार किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)