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अनुवाद
जब कमलाकांत विश्वास ने श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा इस दण्ड के बारे में सुना तो वे बहुत दुखी हुए, लेकिन जब अद्वैत प्रभु ने इसके बारे में सुना तो वे बहुत प्रसन्न हुए।
When Kamalakanta Biswas heard about this punishment given by Sri Chaitanya Mahaprabhu, he became very sad, but when Advaita Prabhu heard about it, he became very happy.
तात्पर्य
भगवद-गीता (9.29) में भगवान कहते हैं, समोहं सर्व-भूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः: "मैं किसी से ईर्ष्या नहीं करता, और न ही मैं किसी के पक्षपाती हूं। मैं सबके लिए समान हूं।" भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं जो सबके बराबर हैं, इसलिए कोई भी उनका शत्रु नहीं हो सकता, और न ही कोई उनका मित्र हो सकता है। चूँकि हर कोई सर्वोच्च व्यक्तित्व का हिस्सा या पुत्र है, भगवान पक्षपाती नहीं हो सकते और किसी को मित्र और किसी को शत्रु नहीं मान सकते। इस प्रकार, जब भगवान चैतन्य महाप्रभु ने कमलाकांत विश्वास को दंडित किया, जिसके बाद उन्हें अनुमति नहीं दी गई, फिर भी यद्यपि दंड वास्तव में बहुत ही कठोर था, श्री अद्वैत प्रभु, दंड के आंतरिक अर्थ को समझते हुए, खुश थे क्योंकि उन्होंने सराहना की कि प्रभु ने वास्तव में कमलाकांत विश्वास का पक्ष लिया था। इसलिए वह बिल्कुल भी दुखी नहीं थे। भक्तों को अपने स्वामी, सर्वोच्च व्यक्तित्व के सभी व्यवहारों से हमेशा खुश रहना चाहिए। एक भक्त को कठिनाई या वैभव में डाला जा सकता है, लेकिन उसे सर्वोच्च व्यक्तित्व के उपहार के रूप में दोनों को स्वीकार करना चाहिए और सभी परिस्थितियों में प्रभु की सेवा में उल्लासपूर्वक संलग्न होना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥