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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.12.35 
ईश्वरेर दैन्य क रि’ करियाछे भिक्षा ।
अतएव दण्ड क रि’ कराइब शिक्षा ॥35॥
 
 
अनुवाद
"परन्तु इसने भगवान के अवतार को दरिद्र भिखारी बना दिया है। इसलिए मैं इसे सुधारने के लिए दण्ड दूँगा।"
 
“But he has turned the incarnation of God into a poverty-stricken beggar, so I will teach him a lesson to correct his mistake.”
तात्पर्य
किसी पुरुष का वर्णन भगवान के अवतार या नारायण के रूप में करना और उसी समय उसे दरिद्र के रूप में प्रस्तुत करना विरोधाभासी है, और यह सबसे बड़ा अपराध है। मायावादी दार्शनिक, वैदिक संस्कृति को यह उपदेश देकर कि हर कोई भगवान है, उसे बिगाड़ने के धर्मप्रचार कार्य में लगे हुए हैं, एक दरिद्र व्यक्ति को दरिद्र-नारायण, या "गरीब नारायण" बताया करते हैं। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने कभी भी ऐसे मूर्खतापूर्ण और अनधिकृत विचारों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने सख्ती से चेतावनी दी, मायावादी-भाष्य सुनिले हाय सर्वनाशः: "मायावादी दर्शन के सिद्धांतों का पालन करने वाला कोई भी व्यक्ति निश्चित रूप से बर्बाद हो जाता है"। ऐसे मूर्ख को दंड देकर सुधारने की जरूरत है।

हालांकि यह कहना विरोधाभासी है कि ईश्वर या उनके अवतार का सर्वोच्च व्यक्तित्व दारिद्रय से ग्रस्त है, हम प्रकट शास्त्रों में पाते हैं कि जब भगवान ने वामन के रूप में अवतार लिया, तो उन्होंने महाराज बलि से कुछ भूमि की भीख मांगी थी। हालाँकि, हर कोई जानता है कि वामनदेव बिलकुल भी दरिद्र नहीं थे। महाराज बली से उनकी भीख माँगना उन्हें कृपा करने का एक उपाय था। जब महाराज बलि ने वास्तव में भूमि दी, तो वामनदेव ने तीन पदचिह्नों के साथ तीनों लोकों को कवर करके अपनी सर्व-शक्तिशाली स्थिति का प्रदर्शन किया। किसी को भी तथाकथित दरिद्र-नारायणों को अवतार के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे ईश्वर के वास्तविक अवतारों के वैभव को दिखाने में पूरी तरह से असमर्थ हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)