हालांकि यह कहना विरोधाभासी है कि ईश्वर या उनके अवतार का सर्वोच्च व्यक्तित्व दारिद्रय से ग्रस्त है, हम प्रकट शास्त्रों में पाते हैं कि जब भगवान ने वामन के रूप में अवतार लिया, तो उन्होंने महाराज बलि से कुछ भूमि की भीख मांगी थी। हालाँकि, हर कोई जानता है कि वामनदेव बिलकुल भी दरिद्र नहीं थे। महाराज बली से उनकी भीख माँगना उन्हें कृपा करने का एक उपाय था। जब महाराज बलि ने वास्तव में भूमि दी, तो वामनदेव ने तीन पदचिह्नों के साथ तीनों लोकों को कवर करके अपनी सर्व-शक्तिशाली स्थिति का प्रदर्शन किया। किसी को भी तथाकथित दरिद्र-नारायणों को अवतार के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे ईश्वर के वास्तविक अवतारों के वैभव को दिखाने में पूरी तरह से असमर्थ हैं।
