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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 12: अद्वैत आचार्य तथा गदाधर पण्डित के विस्तार  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.12.17 
पञ्चम वर्षेर बालक कहे सिद्धान्तेर सार ।
शुनिया पाइला आचार्य सन्तोष अपार ॥17॥
 
 
अनुवाद
जब अद्वैत आचार्य ने अपने पांच वर्षीय पुत्र अच्युतानन्द से यह कथन सुना, तो उन्हें अपने निर्णायक निर्णय के कारण बहुत संतोष हुआ।
 
When Advaita Acharya heard this sentence from his five-year-old son Achyutananda, he felt immense satisfaction, because this was the essence of the principle.
तात्पर्य
श्लोकों १३ से १७ पर टिप्पणी करते हुए, भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने अद्वैत आचार्य के वंशजों का विस्तृत वर्णन किया है। चैतन्य-भागवत, अंत्य-खंड, अध्याय एक में कहा गया है कि अच्युतानंद अद्वैत आचार्य के सबसे बड़े पुत्र थे। संस्कृत पुस्तक अद्वैत-चरित में कहा गया है, "अद्वैत आचार्य प्रभु के तीन पुत्र थे जो भगवान चैतन्य के भक्त थे। उनके नाम अच्युत, कृष्ण मिश्र और गोपाल दास थे, और वे सभी उनकी पत्नी सीतादेवी के गर्भ से पैदा हुए थे। अद्वैत आचार्य के तीन और पुत्र भी थे, जिनके नाम बलराम, स्वरूप और जगदीश थे। इस प्रकार, अद्वैत आचार्य के छह पुत्र थे।" छह पुत्रों में से तीन भगवान चैतन्य महाप्रभु के कड़े अनुयायी थे, और इन तीनों में से अच्युतानंद सबसे बड़े थे।

अद्वैत प्रभु ने पंद्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में शाकाब्द (पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में ई.) में विवाह किया। जब भगवान चैतन्य महाप्रभु शाकाब्द वर्ष 1433 और 1434 (ई. 1511 और 1512) के दौरान जगन्नाथ पुरी से वृंदावन जाते समय रामाकेली गांव की यात्रा करना चाहते थे, तब अच्युतानंद केवल पांच वर्ष के थे। चैतन्य-भागवत, अंत्य-खंड, चौथा अध्याय, उस समय अच्युतानंद का वर्णन पाँच वर्षा वयसा मधुर दिगंबर के रूप में करता है, "केवल पांच वर्ष की आयु और नग्न खड़े।" इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि अच्युतानंद का जन्म 1428 (ई. 1506) के आसपास हुआ था। अच्युतानंद के जन्म से पहले, अद्वैत प्रभु की पत्नी सीतादेवी भगवान चैतन्य महाप्रभु को उनके जन्म पर देखने आई थीं। इस प्रकार, यह असंभव नहीं है कि 1407 और 1428 शाकाब्द (ई. 1486 और 1507) के बीच इक्कीस वर्षों में अद्वैत के द्वारा उनके अन्य तीन पुत्र हुए होंगे। 1792 शाकाब्द (ई. 1870) में अनधिकृत समाचार पत्र नित्यानंद-दायिनी में बंगाली में प्रकाशित सीताद्वैत-चरित नामक एक अनधिकृत पुस्तक में, यह उल्लेख किया गया है कि अच्युतानंद श्री चैतन्य महाप्रभु के कक्षा के सहपाठी थे। चैतन्य-भागवत के अनुसार, यह कथन बिल्कुल भी मान्य नहीं है। जब चैतन्य महाप्रभु ने 1431 शाकाब्द (ई. 1509) में संन्यास के त्यागे हुए आदेश को स्वीकार किया, तो वे शांतिपुर में अद्वैत प्रभु के घर आए। उस समय, जैसा कि चैतन्य-भागवत, अंत्य-खंड, अध्याय एक में कहा गया है, अच्युतानंद केवल तीन वर्ष के थे। चैतन्य-भागवत आगे बताता है कि अद्वैत प्रभु का पुत्र नग्न बच्चा तुरंत आया और भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के चरण कमलों पर गिर पड़ा। भगवान ने तुरंत उसे अपनी गोद में ले लिया, हालाँकि वह बहुत साफ नहीं था, उसके पूरे शरीर पर धूल थी। भगवान चैतन्य ने कहा, "मेरे प्रिय अच्युत, अद्वैत आचार्य मेरे पिता हैं, और इस प्रकार हम भाई हैं।"

श्री चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप में अपने निवास के दौरान अपने आध्यात्मिक रूपों का प्रदर्शन करने से पहले, उन्होंने श्री रामा पंडित, श्रीवास ठाकुर के भाई को शांतिपुर जाने और अद्वैत आचार्य को वापस लाने के लिए कहा। अच्युतानंद उस समय अपने पिता के साथ जुड़ गए। कहा जाता है, अद्वैतरा तनय "अच्युतानंद" नाम / परम-बालक, सेहो कांडे अविरम। अच्युतानंद भी अलौकिक आनंद में रोने में शामिल हुए। फिर, जब भगवान चैतन्य ने भक्ति-योग के सिद्धांतों के विपरीत एक अवैयक्तिक दृष्टिकोण से श्रीमद्-भागवतम की व्याख्या करने के लिए अद्वैत आचार्य को पीटा, तो अच्युतानंद भी मौजूद थे। इसलिए इन सभी घटनाओं को भगवान चैतन्य द्वारा संन्यास क्रम को स्वीकार करने से केवल दो या तीन साल पहले ही घटी होना चाहिए। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, चैतन्य-भागवत, अंत्य-खंड, अध्याय एक में, यह कहा गया है कि अद्वैत आचार्य के पुत्र, अच्युतानंद ने भगवान को अपना प्रणाम दिया। इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि अपने जीवन की शुरुआत से ही अच्युतानंद भगवान चैतन्य महाप्रभु के महान भक्त थे।

ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि अच्युतानंद ने कभी शादी की थी, पर उन्हें अद्वैताचार्य परिवार की सबसे बड़ी शाखा के रूप में वर्णित किया गया है। शाखा_निर्णयामृत नामक एक पुस्तक से यह समझा जाता है कि अच्युतानंद गदाधर पंडित के शिष्य थे और उन्होंने जगन्नाथ पुरी में भगवान चैतन्य की शरण ली और भक्ति सेवा में लगे रहे। चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला, अध्याय दस में कहा गया है कि अद्वैत आचार्य के पुत्र अच्युतानंद भगवान चैतन्य महाप्रभु की शरण लेते हुए जगन्नाथपुरी में रहते थे। गदाधर पंडित, अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, भगवान चैतन्य महाप्रभु के साथ जगन्नाथपुरी में भी रहते थे। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि अच्युतानंद पंडित गदाधर के शिष्य थे। रथ-यात्रा महोत्सव के दौरान भगवान चैतन्य महाप्रभु के रथ के सामने नृत्य करने वालों के वृतांत में अच्युतानंद का नाम कई बार पाया जाता है। यह कहा गया है कि शांतिपुर से अद्वैत आचार्य के समूह में अच्युतानंद नृत्य कर रहे थे और अन्य लोग गा रहे थे। उस समय वह लड़का केवल छह साल का था। श्री कवि-करनपुर द्वारा संकलित गौरा-गणोद्देश-दीपिका के 87वें पाठ में अच्युतानंद को गदाधर पंडित का शिष्य और भगवान चैतन्य महाप्रभु का एक महान और प्रिय भक्त बताया गया है। कुछ लोगों की राय में, वह भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय के अवतार थे और अन्य लोगों के अनुसार वह पहले अच्युता नामक गोपी थी। गौरा-गणोद्देश-दीपिका (88) इन दोनों मतों का समर्थन करता है। श्री नरहरी दास द्वारा संकलित एक अन्य पुस्तक, नरसिंह-विलास, खेटारी में महोत्सव के दौरान अच्युतानंद की उपस्थिति का उल्लेख करती है। श्री नरहरी दास के अनुसार, अपने जीवन के अंतिम दिनों में अच्युतानंद शांतिपुर में अपने घर में रहे, लेकिन भगवान चैतन्य महाप्रभु की उपस्थिति के दौरान वह गदाधर पंडित के साथ जगन्नाथपुरी में रहते थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)