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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.11.7 
असङ्ख्य अनन्त गण के करु गणन ।
आपना शोधिते कहि मुख्य मुख्य जन ॥7॥
 
 
अनुवाद
भक्तों की ये शाखाएँ और उपशाखाएँ असंख्य और असीमित हैं। इन्हें कौन गिन सकता है? अपनी व्यक्तिगत शुद्धि के लिए मैं इनमें से केवल प्रमुख शाखाओं को ही गिनने का प्रयास करूँगा।
 
These branches and sub-branches of devotees are innumerable and boundless. Who can count them? For my own personal purification, I will attempt to list only the most prominent ones.
तात्पर्य
किसी को भी अलौकिक विषय वस्तु पर नाम, प्रसिद्धि या लाभ के लिए किताबें या निबंध नहीं लिखने चाहिए। आध्यात्मिक साहित्य को किसी श्रेष्ठ अधिकारी के निर्देशन में ही लिखा जाना चाहिए क्योंकि इसका उद्देश्य भौतिक उद्देश्यों के लिए नहीं है। यदि कोई श्रेष्ठ अधिकारी के अधीन लिखने का प्रयास करता है, तो वह शुद्ध हो जाता है। सभी कृष्ण-भावनामृत गतिविधियाँ व्यक्तिगत शुद्धिकरण (अपना संोधित करने के लिए) के लिए की जानी चाहिए, भौतिक लाभ के लिए नहीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)