Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  1.11.59 
अनर्गल प्रेम सबार, चेष्टा अनर्गल ।
प्रेम दिते, कृष्ण दिते धरे महाबल ॥59॥
 
 
अनुवाद
इन सभी भक्तों में कृष्ण का अबाधित, अविरल प्रेम प्रदान करने की असीम शक्ति थी। अपनी शक्ति से वे किसी को भी कृष्ण और कृष्ण-प्रेम अर्पित कर सकते थे।
 
All these devotees possessed the immense power to bestow uninterrupted, eternal love for Krishna. Through their power, they could bestow Krishna and Krishna's love upon anyone.
तात्पर्य
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने गाया है कि कृष्ण से तोमार, कृष्ण दिते पार, तोमार शक्ति आछे। इस गीत में भक्तिविनोद ठाकुर बताते हैं कि कृष्ण और कृष्ण प्रेम के स्वामी होने के नाते एक पवित्र वैष्णव इसे किसी को भी और हर किसी को दे सकता है जिसे वह चाहे। इसलिए कृष्ण और कृष्ण प्रेम प्राप्त करने के लिए एक व्यक्ति को शुद्ध भक्तों की दया की तलाश करनी चाहिए। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर भी कहते हैं, यस्य प्रसादात भगवत-प्रसादो यस्याप्रसादान न गतिः कुतोऽपि: "आध्यात्मिक गुरु की दया से एक व्यक्ति कृष्ण की दया से धन्य हो जाता है। आध्यात्मिक गुरु की कृपा के बिना कोई भी उन्नति नहीं कर सकता।" एक वैष्णव या वास्तविक आध्यात्मिक गुरु की कृपा से व्यक्ति कृष्ण और स्वंय कृष्ण दोनों का प्रेम प्राप्त कर सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)