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श्लोक 1.11.57  |
अनन्त नित्यानन्द - गण - के करु गणन ।
आत्म - पवित्रता - हेतु लिखिलाँ कत जन ॥57॥ |
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| अनुवाद |
| नित्यानंद प्रभु के अनगिनत अनुयायियों की गिनती कोई नहीं कर सकता। मैंने उनमें से कुछ का ज़िक्र सिर्फ़ अपनी आत्म-शुद्धि के लिए किया है। |
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| Sri Nityananda Prabhu's numerous followers are incalculable. I have only mentioned a few of them for self-reflection. |
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