श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 11: भगवान् नित्यानन्द के विस्तार  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.11.57 
अनन्त नित्यानन्द - गण - के करु गणन ।
आत्म - पवित्रता - हेतु लिखिलाँ कत जन ॥57॥
 
 
अनुवाद
नित्यानंद प्रभु के अनगिनत अनुयायियों की गिनती कोई नहीं कर सकता। मैंने उनमें से कुछ का ज़िक्र सिर्फ़ अपनी आत्म-शुद्धि के लिए किया है।
 
Sri Nityananda Prabhu's numerous followers are incalculable. I have only mentioned a few of them for self-reflection.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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