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श्लोक 1.11.5  |
श्री - नित्यानन्द - वृक्षेर स्कन्ध गुरुतर ।
ताहाते जन्मिल शाखा - प्रशाखा विस्तर ॥5॥ |
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| अनुवाद |
| श्री नित्यानंद प्रभु श्री चैतन्य वृक्ष की एक अत्यंत विशाल शाखा हैं। उस शाखा से अनेक शाखाएँ और उपशाखाएँ निकलती हैं। |
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| Sri Nityananda Prabhu is the heaviest branch of the Sri Chaitanya tree. From that branch spring many branches and sub-branches. |
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